निशान के खेल में निशाने पर किसान!

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ए आर आज़ाद

मु़गलकालीन और ऐतिहासिक लाल़िकला इन दिनों फिर से जग भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल आज़ादी के बाद जहां प्रत्येक 15 अगस्त पर प्रधानमंत्री के हाथों तिरंगा फहरा करता है। वहीं लोकतंत्र दिवस यानी ठीक गणतंत्र दिवस के दिन ‘निशान साहिब’ को फहरा दिया गया है। इस घटना के बाद किसान आंदोलन का रू़ख ही सरकार ने मोड़ दिया है। एक सोची-समझी नीति के तहत सरकार ने लाल़िकले पर कुछ ऐसी व्यवस्था की जिससे किसानों को लाल़़िकला के अंदर और लाहोरी गेट को पार करते हुए लाल़िकला की ऊपरी मंज़िल तक पहुंच पाना और आसान हो सके। और जिससे सरकार लाल़िकला को अस्मिता से जोड़कर एक भ्रामक प्रचार कर सके।

किसानों ने तिरंगा का अपमान या अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया बहरहाल इसपर चर्चा चलती रहेगी। लेकिन हम इस लेख में बात कर रहे हैं उस सिख धर्म के झंडे की, जिसे लाल़िकले के प्राचीर पर फहराया गया ताकि समझा जा सके कि सिख धर्म का झंडा ‘निशान साहिब’ आ़िखरकार है क्या?

26 जनवरी,2021 के दिन ट्रैक्टर रैली के दौरान जमा हुए किसानों में से पंजाब के एक किसान दिलजेंद्र सिंह ने लाल़िकले की प्राचीर पर चढ़कर सिख धर्म का झंडा ‘निशान साहिब’ फहरा दिया। इसके साथ ही साथ किसान मज़दूर एकता का झंडा भी ‘निशान साहिब’ के साथ लगा दिया गया। हालांकि एक वीडियों के हवाले से कहा जा रहा है कि उसकी पहचान तरण तारण में वान तारा सिंह गांव के रहने वाले जुगराज सिंह के रूप में हुई है।  सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो के मुताबिक़, एक युवा को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वान तारा सिंह गांव के जुगराज सिंह ने लाल कि़ले पर खालसा का झंडा फहराया है। बहरहाल जो भी हो। ़गौरतलब है कि ‘निशान साहिब’ कोई राजनीतिक झंडा नहीं है बल्कि इसे सिख धर्म के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सीधे और सरल शब्दों में इसे आप सिख धर्म के स्वतंत्र व्यक्तित्व का प्रतीक भी मान सकते हैं। सिख धर्म में इसे धार्मिक प्रतीक के रूप में मान्यता दी गई है। यही वजह है कि प्रत्येक गुरुद्वारा एवं सिख के सभी महत्वपूर्ण संस्था एवं संस्थानों पर यह परचम लहराता रहता है। इसका अपना एक इतिहास है।

दरअसल निशान शब्द ़फारसी का अल़्फाज़ है जिसका अर्थ होता है-चिन्ह। इस निशान शब्द के साथ साहिब शब्द को सम्मान के लिए जोड़ दिया गया है। सिख इतिहास के अनुसार निशान साहिब को सिख के छठे गुरु ने इसे धर्म में स्थापित कर दिया। यह तबकी बात है, जब गुरु अर्जन देव की हत्या कर दी गई। सिख धर्म के मुताबि़क पांचवे गुरु ने बाल हरगोविंद को एक पै़गाम भेजा था, इसी पै़गाम को गुरु अर्जन देव का अंतिम संदेश भी कहा जाता है। संदेश था- जाओ और उसे कहो कि शाही सम्मान से कलगी पहने, सेना रखे और सिंहासन पर बैठकर निशान स्थापित करे।

़गौरतलब है कि गुरु बादशाह के वक़्त इसका रंग केसरी यानी भगवा था। लेकिन जब खालसा पंथ का उदय हुआ तो नीला निशान भी इस्तेमाल किया जाने लगा। यही वजह रही है कि इसे उस समय अकाल ध्वज का नाम दिया गया। सिख इतिहास परंपरा के मुताबि़क बाबा बुड्ढा जी ने बाल हरगोविंद को पारंपरिक तौर पर जब गुरु गद्दी सौंपी थी, उस समय बाल हरगोविंद ने कहा था कि इन सभी चीज़ों को राजकोष में रख दो। मैं शाही धूमधाम के साथ कलगी धारण करूंगा और फिर निशान स्थापित करूंगा। सिंहासन पर बैठकर मैं सेना को रखूंगा। मैं भी शहीद हो जाऊंगा। शहादतें अब जंग के मैदान में दी जाएगी। उन्होंने पहली बार मीरी-पीरी की दो तलवारें पहनीं। श्री हरमेंद्र साहिब के ठीक सामने 12 फीट ऊंची मंच स्थापित की। इस स्थापना के पीछे दिलचस्प कहानी है।

दरअसल मंच की ऊंचाई 12 फीट करने के पीछे सत्तासीन बादशाह को चुनौती देना था। क्योंकि उस समय भारत के राजशाही सिंहासन की ऊंचाई 11 फीट हुआ करती थी। बादशाही ़फरमान के मुताबि़क किसी भी दूसरे सिंहासन की ऊंचाई 11 फीट से अधिक दंडनीय अपराध था। इसे जानने के बावजूद भी उन्होंने राजशाही सिंहासन से एक फीट ऊंचा अपना सिंहासन बनाकर तत्कालीन शहंशाहों को चुनौती भी दी और आईना भी दिखाया। सिख इतिहास में दो निशान स्थापित किए गए थे, जिसे पीरी और मीरी के निशान कहे जाते हैं। पीरी ऊंचाई में मीरी से सवा फीट ऊंचा है। अब फिर से लाल़िकला प्राचीर ‘निशान साहिब’ फहराए जाने की घटना पर लौटते हैं। यह वही समुदाय है जिसने मु़गल बादशाह के शासन काल में भी बादशाहों के तु़गलकी ़फरमान को सहज स्वीकार नहीं किया। और उस समय भी उन्होंने खुली चुनौती दी और बादशाह को आईना दिखाया। आज लगभग चार सौ सालों के बाद उसी सिख पीढ़ी ने एक लोकतांत्रिक सरकार के राजशाही हठ करने पर उसे सब़क सिखाने के लिए अपने पूर्वजों की गाथाओं को दोहराकर सत्तासीन हुक्मरानों को आईना दिखाने का काम किया है। सिख समुदाय ने न कल देश की अस्मिता के साथ खेला था और न ही देश की अस्मिता के साथ आज खेल रहा है। दरअसल खेल तो सरकार कर रही है। और इस खेल में निशाने पर किसान हैं।