अदावत के बाद दावत की पहली तस्वीर दिखेगी 24 जून को

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दिल्ली और जम्मू-कश्मीर का सियासी फोन कनेक्शन शुरू

प्रधानमंत्री ने कश्मीरी नेताओं को दावत पर बुलाया 

 

ए आर आज़ाद

5 अगस्त, 2019 की तल्खी को कम करने की कोशिश मानें या जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक परिदृश्य को वहां के विभिन्न दलीय नेताओं की जुबान से मौजूदा परिस्थिति को समझने की कोशिश मानें। लेकिन इतना तय है कि 24 जून,2021 को तीन बजे दिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीरी रहनुमाओं से चर्चा करने के लिए आतुर हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आवास पर जम्मू-कश्मीर के सभी दलों के बड़े नेताओं को बुलावा भेजा है। फोन के जरिए सबको दावत दे दी गई है। और विधिवत रूप से संदेश भी उन्हें समय रहते भेज दिया जाएगा।

गौरतलब है कि लगभग दो सालों से जम्मू-कश्मीर के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच लगभग कोई संवाद स्थापित नहीं हुआ था। जैसे ही 2019 के लोकसभा चुनाव संपन्न हुए। और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई। उसके 70-75 दिनों के भीतर ही यानी 5 अगस्त, 2019 को अपनी कार्रवाई को अंजाम दिया। यानी मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जा को एक ही झटके में रातों-रात खत्म कर दिया। और तब से अब तक कोई भी बैठक नहीं हुई। यानी आप कह सकते हैं कि साढ़े अठारह महीनों के बाद दिल्ली और जम्मू-कश्मीर का फोन कनेक्शन शुरू हुआ। इस फोन कनेक्शन से उम्मीद जगी है कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के बीच मुलाकात का एक दौर शुरु होगा। और वहां की राजनीतिक परिदृश्य और वस्तुस्थिति का नजरिया प्रधानमंत्री को समझने में आसान होगा।

दरअसल 5 अगस्त,2019 के बाद जम्मू-कश्मीर के लगभग सारे बड़े नेताओं को और विभिन्न पार्टियों के कद्दावर नेताओं को नजरबंद कर दिया गया था। चाहे वह पीडीपी की महबूबा मुफ्ती हों या नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ही क्यों न हों। उसी तरह अन्य दलों के भी विभिन्न नेताओं को केंद्र सरकार की नजरबंदी की यातना से दो-चार होना पड़ा था। महबूबा मुफ्ती के चाचा और पीडीपी के सीनियर लीडर सरताज मदनी को दो बार नजरबंद कर दिया गया। छह महीने तक हिरासत में रखने के बाद उन्हें अभी-अभी रिहा किया गया।

 

जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं को जम्मू-कश्मीर सहित देश के विभिन्न जेलों में राजनैतिक कैदी बनाकर रखा गया। संभव है कि जम्मू-कश्मीर के विभिन्न दलों के 14 नेताओं की प्रधानमंत्री से होने वाली मीटिंग में बातचीत के दौरान संभव है कि राजनैतिक कैदियों को रिहा करने की मांग भी उठेगी। प्रधानमंत्री को इसपर विचार करना पड़ सकता है।

मालूम हो कि धारा 370 की बहाली को लेकर पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लियरेशन यानी पीएजीडी संगठन अस्तित्व में आया। इसके अध्यक्ष नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया फारुख अब्दुल्ला हैं। लाजमी है कि प्रधानमंत्री के इस दावतनामे  पर गुपकार का क्या रूख और रवैया रहेगा? इसपर उसकी क्या रणनीति बनेगी? और प्रधानमंत्री के साथ बैठक में वे किन-किन मुद्दों पर खास चर्चा करेंगे और अपनी किन मांगों को मनवाने के लिए जोरदार और धारदार तरीके का इस्तेमाल करेंगे? इसपर गुपकार की बैठक होनी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के बीच की राजनीतिक चुप्पी यानी सियासी खामोशी की जमी बर्फ को बातचीत की गर्मी से जो पिघलाने की शुरूआत की है, वह कितनी कारगर होगी? यह 24 मई की शाम को कुछ बानगी के तौर पर हमारे और आपके सामने होगा।

संभावना यह भी जताई जा रही है कि प्रधानमंत्री विभिन्न दलों की बैठक इसलिए भी बुला रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में होने वाले विधानसभा के चुनाव पर चर्चा कर सकें।

दरअसल चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर का परिसीमन भी होना है। लाजमी है कि इस पर भी चर्चा हो। और प्रधानमंत्री का सर्वाधिक एजेंडा परिसीमन और जम्मू-कश्मीर का विधान सभा चुनाव ही हो।

यह भी आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर में और कुछ नया बदलाव लाना चाहते हों। और उस बदलाव को मूर्त रूप देने के लिए और उसपर मुहर लगाने के लिए वहां के राजनैतिक शुरमाओं के साथ बैठक करने जा रहे हों।