फज़लुर रहमान हाशमी की कविताओं में पौराणिक संदर्भ

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डा जियाउर रहमान जाफरी

जब भी बेगूसराय की साहित्यिक विरासत की बात आती है तो निश्चित रूप से रामधारी सिंह दिनकर के बाद फ़ज़लुर रहमान हाशमी का नाम आता है। फ़ज़लुर रहमान हाशमी का साहित्यिक फलक  बहुत बड़ा है। वह मैथिली के जितने मशहूर कवि हैं, उतने  ही उर्दू और हिंदी के भी। उनकी पकड़ धर्मशास्त्र पर बड़ी गहरी है। वह दर्शनशास्त्र और नीति शास्त्र के भी विद्वान थे। उनकी जानकारी जितनी हदीस और ़कुरआन की थी, उतना ही वह रामायण, महाभारत और उपनिषद में भी पारंगत थे। गीता का तो उन्होंने उर्दू में काव्यात्मक अनुवाद भी किया था। शापित कर्ण नामक उनका एक प्रबंध काव्य भी मौजूद है।

स्व. हाशमी की एक महत्वपूर्ण काव्यगत विशेषता यह थी कि वह अपनी रचना और अपनी कविताओं में पौराणिक संदर्भों का ़खूब इस्तेमाल करते रहें, जो उनकी धर्म के प्रति गहरी जानकारी का परिचायक है। उनके द्वारा लिखी गई मैथिली खंड काव्य हरवाहक बेटी राम काव्य परंपरा की मैथिली में लिखी गई एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस कृति में सीता की ज़मीन से उदित होने का बड़ा ही सुंदर और मार्मिक वर्णन किया गया है।

 एक अनुवादक और संचालक के तौर पर भी उनकी अपनी ख्याति है। साहित्य अकादमी की किताब मीर तकी मीर, अबुल कलाम आजाद और फ़िराक़ गोरखपुरी का उन्होंने मैथिली में अनुवाद किया है। अबुल कलाम आज़ाद की किताब पर उन्हें मैथिली का साहित्य अकादमी   पुरस्कार प्राप्त हुआ था। वह साहित्य अकादमी भारत सरकार के लगभग 5 वर्षों तक सलाहकार और कई सालों तक जूरी भी रहे। कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उनका संचालन बड़ा जानदार होता था। उनके संचालन किसी भी कवि सम्मेलन या मुशायरे के कामयाब होने की गारंटी थी। सिर्फ भारत ही नहीं नेपाल के कवि सम्मेलनों में भी एक संचालक के तौर पर उन्हें याद किया जाता रहा है।

फ़ज़लुर रहमान हाशमी सर्वधर्म समभाव के एक मिसाल थे। वह इंसान को इंसान की तरह देखना चाहते थे। उनके अंदर किसी प्रकार का कोई गुरूर अहं या विद्वता का अहंकार नहीं था। उनकी इस्लाम धर्म पर गहरी पकड़ थी। उन्होंने हिंदू धर्म के बारे में भी कई महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। और हिंदू धर्म को एक संवेदनशील, प्रेमी, और सहिष्णु धर्म की तरह देखा। उनके मैथिली साहित्य पर जहां कई शोध-छात्रों ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की वहीं मिथिला यूनिवर्सिटी ने उन्हें आचार्य की डिग्री प्रदान की। आपने रामायण, महाभारत, गीता और पुराण का गहरा अध्ययन किया था। महावीर कैंसर संस्थान पटना की पत्रिका धर्मायण के वो नियमित लेखक थे। जहां राम के जीवन पर उनका शोधपरक आलेख बहुत पसंद किया जाता था। पौराणिक पात्रों में श्रीराम, श्रीकृष्ण, कर्ण, भीष्म और अर्जुन उनके प्रिय पात्र रहे।

उनकी हिन्दी ग़ज़ल की कृति मेरी नींद तुम्हारे सपने के कई शेर इस संदर्भ की पुष्टि करते हैं। उदाहरण के लिए कुछ शेर देखे जा सकते हैं..

बाधक कभी रण  क्षेत्र में रिश्ता नहीं होता
भीष्म  वहां पार्थ का दादा नहीं होता

 गीता का आदर्श रहा है कर्म करो फल मत देखो
लेकिन अब तो सोचना होगा हर को फल के बारे में

 हम भी शायद कौवे  ही हैं
बेल लगे हैं कितने पकने

 फिर से देख कुरुक्षेत्र को
अर्जुन मत जा बर्फ में गलने

 ग़म में जो लोग मुस्कुरा ना सके
जि़ंदगी के क़रीब आ न सके

 उनकी कि़स्मत में कब है वैदेही
जो धनुष को कभी उठाना सके

 तैयार है प्रदूषण सांसों में ज़हर  देने
सुकरात से शिव से इसे पीने को कहा जाए

 हो भले राम और ़खुदा लेकिन
नर स्वयं भाग्य का विधाता है

 हिंदी कविता परंपरा में उर्मिला को लेकर बहुत कम लिखा गया। उर्मिला पर सबसे पहले रविंद्र नाथ टैगोर ने लिखा और बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था-उर्मिला विषयक उदासीनता। मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कृति साकेत में भी उर्मिला के दुख का बयान किया गया है। श्रीराम जंगल में हैं  लेकिन सीता उनके साथ है। श्रीराम के साथ लक्ष्मण भी मौजूद हैं लेकिन उर्मिला लक्ष्मण से दूर है फिर भी हिंदी कवियों की दृष्टि उर्मिला पर आरम्भ में नहीं गई। स्व. हाशमी की कई कविताओं में उर्मिला के प्रति पूरी सहानुभूति दिखती है। एक दो शेर  देखने योग्य है-

हो अब फिर से सागर मंथन
नमक निकाल ले मात्र कई टन

उर्मिला को वन में भूले
एक पत्र भी लिखते लक्षण

लेखक मानते हैं कि भारत कई विशेषताओं वाला देश है। ये मुहब्बत की इतनी गहरी ज़मीन है कि कोई विभीषण या रावण भी इसका कुछ नहीं कर सकता –

हमें आए थे जग में आर्य  बनकर
किसके पास ऐसा कारवां है

यहां की लोगों की बातें तो छोड़ो
विभीषण भी जो आया तो अमां है

राम काव्य परंपरा और कृष्ण काव्य परंपरा में सबसे बड़ा अंतर यह है कि राम का रूप जहां हमारे सामने एक आदर्श रूप बनकर आता है, वहीं  कृष्ण का रूप लोक-रंजक रूप है। स्व. हाशमी का एक प्रसिद्ध शेर है-

कृष्ण के हिस्से में है मंगल
राम के हिस्से जंगल क्यों है

 दिनकर कुरुक्षेत्र लिखते हैं और  इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अमन और शांति ज़रूरी है लेकिन अमन और शांति के रक्षार्थ कभी-कभी खडग और हथियार भी उठाना पड़ता है। स्व. हाशमी की भी फ़िक्ऱ है-

रण से हमको क्यों डरना है रण ने कर्म महान किया
रण से रामायण को पाकर गीता में स्थान दिया

मनुष्य की उत्पत्ति मनु या आदम से हुई। लेकिन डार्विन यह बताता था कि मनुष्य की उत्पत्ति किसी बंदर से हुई है। डार्विन के अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि मनुष्य की उत्पत्ति मनु या आदम से ही हुई है। स्व. हाशमी का एक शेर भी देखने योग्य है-

किसी के हाथ में ख़ंजर कहां है
ये धड़ तो देखता हूं सर कहां है

मनु था आदमी इतिहास देखो
बताओ डार्विन बंदर कहां है

ग़ज़ल को उर्दू में प्रेम-काव्य की संज्ञा दी गई। हिंदी में जब ग़ज़ल लिखी गई तो उन्होंने ग़्ाज़ल का प्रेम-रूपी चोला छोड़ दिया और समसामयिक समस्याओं से जाकर जुड़ गई। फिर भी ग़्ाज़ल में पौराणिक संदर्भों और पौराणिक पात्रों का इस्तेमाल बहुत कम हुआ।

अगर ईमानदारी पूर्वक देखा जाए तो ग़ज़ल में पौराणिक संदर्भों और पौराणिक प्रतीकों का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा फ़ज़लुर  रहमान हाशमी की शायरी में हुआ है। एक-दो शेर नहीं उनकी कई मुकम्मल ग़ज़लें  हैं, जिनके हर शेर में किसी न किसी पौराणिक संदर्भों का इस्तेमाल देखा जाता है। उदाहरण के लिए एक ग़ज़ल के कुछ शेर देखे जा सकते हैं-

दुख में जो लोग मुस्कुराते हैं
लुत्फ़ जीने का वह उठाते हैं

वह सभी धार्मिक स्थल हैं
जिस जगह माथा हम झुकाते हैं

हम को क्या देंगे ईश्वर यारों
तीन पग हम से ले के जाते हैं

हम बनाते हैं पुल को सागर पर
कह दो रावण से आ जाते हैं

अपनी तलहत्थी  देख अंधे को
दृश्य रण क्षेत्र का बताते हैं

मांगने के लिए कवच कुंडल
इंद्र ़खुद मेरे पास आते हैं

ऐसी ही उनकी कई ग़ज़लें हैं जो पूरी की पूरी ग़ज़ल किसी ने किसी राम काव्य परंपरा या कृष्ण काव्य परंपरा पर आधारित है। एक अन्य ग़ज़ल के कुछ शेर मुलाहिजा हों-

नोटों पर बिकता ईमान
कितना मुश्किल कन्यादान

राम के घर रावण का भाई
है इतिहास बहुत हैरान

फिर अर्जुन के पीछे क्यों है
दे एकलव्य  अंगूठा दान

आओ केशव फिर से आओ
कर्म का देने हमको ज्ञान

तटस्थ रहे जो महा समर में
विदुर कर हमसे थे अनजान

हाशमी मथुरा गोकुल भूले
देश के अब सारे रसखान

इस प्रकार हम देखते हैं कि उनकी  ग़ज़लों के पौराणिक प्रतीक मात्र पौराणिक नहीं रहते बल्कि आधुनिक सन्दर्भों और समस्याओं से टकराते हैं। कुछ शेर मुलाहिजा हो-

हाशमी कर्ण में उतनी ़खूबी न थी
हम तो धोखे से सबसे बड़ा कह गए

करोगे कहां तक उसे माफ़ केशव
शिशुपाल को सिर कटाना  पड़ेगा

सोचा था रामराज मिलेगा न मिल सका
हनुमान ने फ़िजूल ही लंका जला दिया

लक्ष्मण जी अपनी औषधि अब आप लाइए
वह दौर था के काम किसी ने चला दिया

रहना पड़ा जो सांप के जंगल में हाशमी
हमने भी इस शरीर को चंदन बना दिया

हां अब हनुमान नहीं आमादा बूटी को ले आने को
लक्ष्मण अब बेहोशी तोड़ो खुद से बूटी लाना है

वह तो इस धरती पर अपनी धरती कह काबिज  है
अपने केशव सदन में बोले सुयोधन को समझाना है

राम की चिंता ऐसे में थी लक्ष्मण की कुछ और ही थी
शबरी को बस एक ही चिंता जूठा  बेर खिलाना है

रामायण में शूर्पणखा के नाक कटने का वर्णन है। ये शूर्पणखा लक्ष्मण को अपनी साजि़श के तहत रिझाने आई थी। कवि हाशमी इस संदर्भ का वर्णन भी कितनी ़खूबी से करते हैं-

यह मत समझो भ्रष्टाचार को कोई नहीं मिटाएगा
शूर्पणखा जब भी आएगी हम लक्ष्मण बन जाएंगे

कृष्ण ने शिशुपाल को सौ बार माफ़ कर दिया था। लेकिन आज का शासक माफ़ी में विश्वाश ही नहीं करता-

इतनी ही ग़लती काफ़ी है इसका दंड ज़रूरी है
शिशुपाल की सौ ग़्ालती पर माफ़ी मुहर लगाए कौन

उनकी एक मशहूर ग़ज़ल है। जिस एक ग़ज़ल में रामायण भी, पुराण भी और इतिहास दर्शन भी है –

छोटी पुतली में कितना है बांकपन
रोक लेते हैं हमको तुम्हारे नयन

देवता का न नुक़सान गौतम से है
बस अहल्या का होता है पत्थर बदन

जिसको मारीच कहते हैं रावण कथा
एक किराए का वह उग्रवादी हिरण

इसी प्रकार शापित कर्ण के नाम से उनकी एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है, जिसमें कृष्ण, अर्जुन और कर्ण की कथा को सरल तरीक़े से रखा गया है। इस ग्रंथ की अंतिम पंक्ति ये कहकर ख़त्म होती है कि-

बहुत कम ही हुआ इंसान वैसा
ना होगा फिर कहीं भी कर्ण जैसा

कहना न होगा कि स्व. हाशमी ने अपनी ग़ज़लों और कविताओं में जिन पौराणिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया है, वो आज भी हमारे लिए बल, संबल और आदर्श प्रस्तुत करते हैं।