हिम्मत की स्याही से क्रांतिकारी शब्दों के ज़रिए बदलाव की लौ जलाता एक संपादक

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हरि ओम

दूसरा मत- संतुलित, संयमित, धारदार, सूक्ष्म विश्लेषण और सारगर्भित। भीड़ से बिल्कुल अलग। हर बार कुछ नया। कुछ सीखने लायक़, कुछ सिखाने वाला। जैसे कोई काग़ज़ पर उकेरे शब्द नहीं, मानो ़खुद इंसान बैठकर बातें कर रहे हों। समझा रहा हो। मतों के मायाजाल का भंवर नहीं बल्कि एक अलग नज़रिया। चंद शब्दों में 20 साल के सफ़र को समेटना आसान नहीं है। ऐसा होना भी नहीं चाहिए। ये अपराधबोध लगता है।  लेकिन दूसरा मत के निरंतर पाठक होने के नाते मेरे मन में अनायास ही ये भाव आते रहते हैंं, जो मैंने बताए।

मेरी मानिए तो किसी भी पत्रिका को पढ़ने से पहले आप ़खुद से पूछिए। आप उसमें क्या पढ़ना चाहते हैं? क्या देखना चाहते हैं? यक़ीन मानिए तो दूसरा मत पत्रिका में आपको हर वो चीज़ मिलेगी जिसे आप पढ़ना चाहते हैं। इसमें बड़े-बड़े बनावटी नामों की तरह शब्दों की कलाबाज़ी नहीं होती। जाने-माने पत्रकारों का संतुलित पक्ष तो आपका नज़रिया दूसरों से अलग बनाता है।

इस पत्रिका की कुछ कॉलम आपको ज़रूर पढ़ना चाहिए। प्रसंगवश, विचार, मंथन, समाज, जीवन शैली और जि़ंदगी। प्रसंगवश में खरी-खरी और टू द प्वाइंट बातें होती हैं। विचार में गहराई से विश्लेषण नज़र आता है। मंथन में फैक्ट्स और फ़्यूचर दोनों का तालमेल नज़र आता है। जिं़दगी बदलने वाली और प्रोत्साहित करने वाले दो स्तंभ जीवन शैली और जि़ंदगी है। समाज में हमें ज़बरदस्त सामाजिक नज़रिया देखने को मिलता है।

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके,
पाते हैं जग में प्रशस्ति करतब दिखलाके।

किसी भी सफ़र के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी होती है। इस पत्रिका के लगभग 20 सालों के सफ़र के दौरान भी यह कहानी सामने आई। तेज़ी से बढ़ते भौतिकवाद के दौर में आर्थिक बाधाओं से निपटना सबसे मुश्किल काम था। एक पत्रकार का धर्म था कि वो इस हालत में ना डिगे, ना हिम्मत हारे। ए आर आज़ाद साहब ने पत्रकार होने का फ़जऱ् निभाया। उनकी कलम समझौते को कभी भी तैयार नहीं हुई और हिम्मत की स्याही से क्रांतिकारी शब्दों के ज़रिए बदलाव की लौ जलाती रही।

‘गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में,
वो तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले।’

ए आर आजाद साहब की यही ़खूबी रही। संपादक होने के नाते उन्होंने समाज के लिए अपनी जि़म्मेदारियां निभाई। वे भौतिकवादी    पत्रकार नहीं, जुझारू पत्रकार बनकर रहे।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दूसरा मत का कामयाबी का ये सफ़र बुलंदियों को हासिल करे। मैं पाठकों से भी कुछ अनुरोध करना चाहता हूं कि आप अपना आशीर्वाद और प्रेम दूसरा मत को देते रहें, जिससे यह पत्रिका नित्य नए आयाम को छू सके। आपके स्नेह के बग़्ौर यह संभव नहीं है। भविष्य के लिए ढ़ेर सारी शुभकामनाएं। ’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

किसी भी सफ़र के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी होती है। इस पत्रिका के लगभग 20 सालों के सफ़र के दौरान भी यह कहानी सामने आई। तेज़ी से बढ़ते भौतिकवाद के दौर में आर्थिक बाधाओं से निपटना सबसे मुश्किल काम था। एक पत्रकार का धर्म था कि वो इस हालत में ना डिगे, ना हिम्मत हारे।

ए आर आज़ाद साहब ने पत्रकार होने का फ़जऱ् निभाया। उनकी कलम समझौते को कभी भी तैयार नहीं हुई और हिम्मत की स्याही से क्रांतिकारी शब्दों के ज़रिए बदलाव की लौ जलाती रही।