नहीं रहे इस्लामिक विद्वान और धर्मगुरु वली रहमानी

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राजकीय सम्मान के साथ सर्पूद ए ख़ाक़

 

पूरी दुनिया में शोक की लहर

 

ए आर आज़ाद

 

विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर, मुसलमानों के लोकप्रिय धर्मगुरु और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव जनाब हज़रत वली रहमानी 4 अप्रैल को मुंगेर में सुपुर्द ए ख़ाक़ हो गए। इमारत ए शरीया बिहार, झारखंड और उड़िशा के अमीर ए शरीअत हज़रत वली रहमानी की मौत तीन अप्रैल की दोपहर पटना के पारस अस्पताल में इलाज के दौरान हो गया। दरअसल वली रहमानी ने 18 मार्च को पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में कोरोना की वैक्सीन ली थी। और इस वैक्सीन लेने के साथ ही उनकी तबियत बिगड़ गई। और फिर उन्हें 28 मार्च को पटना के पारस अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान ही उन्होंने पारस अस्पताल में दम तोड़ दिया।

हज़रत मौलाना वली रहमानी मुंगेर में मौजूद ़खाऩकाह रहमानी के सरपरस्त और सज्जादानशीं भी थे। इसलिए उन्हें सर्पूद ए ़खा़क करने के लिए पटना से मुंगेर ़खाऩकाह लाया गया। दरअसल मौलाना वली रहमानी की पैदाइश मुंगेर में ही 5 जून,1943 को हुई थी। मौलाना वली रहमानी की मौत की ़खबर सुनकर पूरे देश और दुनिया के लोगों में हलचल मच गई। हर तरफ सदमा का माहौल और ़गमज़दा आंखों से छलकते आंसूओं से सैलाब ने सवाल की शक़्ल में एक दूसरे से पूछने लगा, अब फिर कहां से आएंगे दूसरे वली रहमानी?

यह सवाल इसलिए उठने लगा कि वली रहमानी भी अपने पिता मौलाना मिन्नतुल्लाह रहमानी की तरह क़ौम के लिए चिंतित रहते थे, फ़िक़्रमंद रहा करते थे। एनआरसी, सीएए एवं कुछ ऐसे ही मुद्दों पर मौलाना वली रहमानी हमेशा मुखर रहे। और जिस तरह से उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा और देश सहित पूरे बिहार में इसके ख़िलाफ़ आंदोलन और मुहिम चलाई, इससे वे युवाओं के भी आईकॉन बन गए।

मौलाना वली रहमानी का सरोकार सिर्फ इमारत शरीआ-बंगाल, बिहार, उड़िशा के अमीर ए शरीअत तक ही नहीं रहा या ख़ाऩकाह रहमानी के सज्जादानशीं तक ही नहीं है, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटी तक ही नहीं रहा बल्कि 78 वर्षीय मौलाना वली रहमानी का सरोकार बिहार की राजनीति से भी रहा।

दुनिया भर में इस्लामिक स्कॉलर के रूप में पहचान बनाने वाले वली रहमानी 1985 में बिहार विधान सभा परिषद के सभापति भी रहे। वली रहमानी 1974-1996 तक लगभग 22 वर्षों तक बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रहे यानी एमएलसी भी रहे। और यही वजह है कि उनके निधन पर राजनीतिक जगत में भी शोक की लहर फैल गई। सरकार तो सरकार विपक्ष ने भी अपने शोक-संदेशों के ज़रिए मौलाना वली रहमानी के योगदानों का जि़क्ऱ करते हुए उनकी म़ग़िफरत की दुआएं की। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, जीतन राम मांझी, पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव, पूर्व सांसद पप्पू यादव, और बिहार के कई गणमान्य नेता शामिल हैं।

मरहूम वली रहमानी सामाजिक उत्थान और समाज में फैले दुर्विचार और दुष्प्रचार एवं दुष्प्रभाव को ़खत्म करके गंगा-यमुनी तहज़ीव को जीवंत करने की जद्दोजहद में जुटे लोगों में से एक धरोहर थे। उनके जाने से उनके खालीपन का एहसास हमें डराता है। और थोड़ा विचलित भी करता है। वली रहमानी, रहमानी-30 के संस्थापक भी थे। उनके निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहरे शोक का इज़हार किया। और उनके सम्मान में मौलाना वली रहमानी के अंतिम रस्म को पूरे राजकीय सम्मान के साथ पूरा कराने का हुक्म जारी किया। और अपने लंबे-चौड़े शोक-संदेश में उनके अभूतपूर्व योगदानों की सराहना की।

मौलाना वली रहमानी का क़द कितना बड़ा था और उनकी जनता के बीच कितनी ़कद्र थी, उसका सही-सही पता उनकी मौत के बाद ही दुनिया को लग सका। दुनिया छोड़ चुके वली रहमानी को जब 4 अप्रैल यानी शनिवार की देर रात एंबुलेंस के ज़रिए पटना से मुंगेर लाया गया तो उनके आ़िखरी दीदार के लिए मुंगेर आने वाली सड़कों पर पूरे बिहार के लोगों का काफिला उमड़ पड़ा। चाहे वह कोशी क्षेत्र हो या सीमांचल क्षेत्र का या मिथिलांचल का इला़का। या फिर उत्तर बिहार का इला़का यानी बिहार के लगभग सभी ज़िलों से गाड़ियों का काफिला मुंगेर की सड़कों की तरफ दौड़ता रहा, भागता रहा।

नतीजतन अहले सुबह मुंगेर गंगा घाट की  व्यवस्था ही चरमरा गई। फिर भी वली रहमानी के अ़कीदत में लोगों ने उनके आ़िखरी दीदार के लिए नौका से गंगा पार किया। बेचैनी और बेबसी के आलम में हज़ारों लोग पैदल ही गंगा पुल पार करके मुंगेर पहुंचे। काफिले में तेज कदमों से बढ़ते हर शख़्स की आंखों में वली रहमानी के अंतिम दीदार की बेचैनी झलक रही थी।

ख़ानक़ाह में वली रहमानी के अंतिम दीदार और अंतिम दर्शन के लिए पहुंची भीड़ से लंबी लाइन लग गई। और इतनी लंबी लाइन लग गई कि सबके लिए उनका दर्शन करना सहज नहीं रह गया।

मौलाना वली रहमानी ने हमेशा देश, समाज, क़ौम और मिल्लत के लिए अपना अनूठा पै़गाम दिया। शब ए बरात के मौ़के पर भी उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि रमज़ान में जिस तरह जायज़ चीज़ खाना और पानी को भी रोज़ा के दौरन छोड़ दिया जाता है। उसी तरह नाजायज़ चीज़ को भी आप छोड़ने के लिए अपने आप को तैयार करें और अपनी ज़िदगी में इसकी आदत भी अभी से डाल लें। उन्होंने मुसलमानों से अपनी अपील में कहा कि अपने-अपने मसलक पर क़ायम रहते हुए मिल्लत पर ध्यान दें। उन्होंने देश के लोगों से कहा कि कोरोना तो फौरी बीमारी है। आई है, चली जाएगी। लेकिन एनआरसी और सीएए जैसे कुछ मुद्दे हैं जिसपर एकजुटता दिखाने की सख़्त ज़रूरत है क्योंकि ऐसे मुद्दों को एकता की ता़कत से ही ख़त्म किया जा सकता है।

उन्होंने मुसलमानों से, मस्जिद प्रमुखों से, मदरसा के सरपरस्तों से अपील में कहा था कि रमज़ान के दौरान देर रात या सेहरी के दौरान लाउड स्पीकर का इस्तेमाल न करें। बिना वजह लाउड स्पीकर के इस्तेमाल से बचें। ज़ाहिर सी बात है कि वली रहमानी का ध्यान समाज के ताने-बाने और मौजूदा मिजाज़ पर भी रहा।  यही वजह है कि उन्होंने देश की एकता को बनाए एवं बऱकरार रखने के लिए अपने लोगों से  लाउड स्पीकर से गुरेज़ और परहेज़ करने की अपील की।

अब सवाल है कि नेतृत्व विहीन मुस्लिम समाज के सामने लीडरशिप का सवाल फिर से पैदा हो गया है। इस समाज को फिर कहां से मिलेगी वली रहमानी जैसी शख़्सियत, यह सवाल क़ौम के हर शऊरमंद लोगों के के ज़हन को बेचैन करने के लिए काफी है। मुस्लिम समाज के लिए वली रहमानी के बताए गए रास्तों पर चलना ही उनके लिए ह़की़कत में खै़राज ए अ़कीदत होगी।