1940 की मां

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सुमन यादव

‘मेरी मां’ यूं तो ये शब्द ही अपने आप में महान है। त्याग व ममता की मूर्ति के रूप में मां को जाना जाता है। मैं आपको 1940 की मां से मिलवाना चाहती हूं।

सामान्य परिवार में 1924 को मेरी मां का जन्म हुआ। करीब पांच या छह वर्ष की थी, तो सिर से पिता का साया उठ गया। दूसरे पिता का साया मिला। लेकिन नियति ने उनको भी छिन लिया। और कुछ वर्ष बाद ही वे भी ईश्वर को प्यारे हो गए। उस समय मां की उम्र तकरीबन 13-14 साल की रही होगी। तब मां की शादी उनकी मां यानी मेरी नानी ने कर दी। पति इतने महान मिले कि उस तरह का कोई और उदाहरण मिलना असंभव ही लगता है।

मां का नाम रानी था। जिनसे उनकी शादी हुई, उन्हें लोग बाबू जी के नाम से जानते थे। एक दिन ‘रानी’ अपनी सासू मां से बोली,-हम पढ़ना चाहते हैं। दरअसल मां पढ़ने-लिखने में काफी दिलचस्पी रखती थी। यह सुनकर, सासू मां ने मां की हौसला अफजाई की। उन्होंने हामी भर दी। और घर के काम के लिए काम वाली रख दिया। और उन्होंने अपनी बहू को पढ़ने की इजाजत दे दी। उनकी सासू मां सही मायने में महान थीं। क्योंकि उस ज़माने में बेटी को भी पढ़ाने का कम रिवाज़ था। फिर ससुराल में रहकर किसी बहू को पढ़ने का चलन ही कहां था? फिर भी उन्होंने स्वीकृति यह कहते हुए दी कि बाबू तो पढ़ा-लिखा नहीं है, बहू तुम्हीं पढ़ो।

अंग्रेजों का शासन था। उस समय लोवर मीडिल व अपर मीडिल की पढ़ाई हुआ करती थी। पढ़ाई आरंभ हो गई। लोवर मीडिल की परीक्षा हुर्ई। उसमें उन्हें प्रथम स्थान मिला। और गणित में तो शत प्रतिशत अंक मिले।

आजादी का संग्राम चारों तरफ था। आजादी पाने के लिए लोग बेकरार थे। तमाम कार्यक्रम चल रहे थे। इस बीच बाबू जी को स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के जुर्म में नौ महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। अब घर को देखना, कारागर में समय पर मिलने जाना, जैसी इन सभी समस्याओं को; समस्या न समझ कर, जीवन की चुनौतियां समझकर उस पर उन्होंने विजय पा ली।

मुहल्ले वाले पढ़ाई को लेकर अजीब शैली का प्रयोग करते, क्योंकि उस समय लोग महिला शिक्षा के विरुद्ध थे। लेकिन इन सब बातों का मां पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

स्वाभिमानी इतनी थीं कि एक बार पन्द्रह रुपए की आवश्यकता पूरी करने के लिए उन्होंने अपने कान के सोने के गहने गिरवी रख दिए। बाद में वापिस भी नहीं मिला। लेकिन उन्हें इसका कोई मलाल तक नहीं हुआ।

उन्होंने अपने प्रमाण-पत्र को कभी हमलोगों को  दिखाया तक नहीं। मरणोपरांत उनकी थैली से वह प्रमाण-पत्र कीड़ा खाया हुआ मिला।

अब तो सब भाई-बहन समृद्ध हैं। शीर्षक 1940  की मां से तात्पर्य यह है कि उस सत्र में पुत्र को जन्म देकर मां बनने का गौरव प्राप्त किया था।

उन्होंने अपने जन्म को सार्थक बनाया। अपने सब बच्चों के जीवन को सही दिशा दी। ऐसी मां को मातृ दिवस पर शत-शत नमन! संसार की सभी मांओं को हृदय से नमन करती हूं।

बेटी सुमन यादव