बिहार में अभी सत्ता परिवर्तन का खेला होबो न

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विधानसभा की संख्या 243, बहुमत का आंकड़ा 122

एक बड़ा सवाल नीतीश की नैया डुबोएंगे मांझी?

दरअसल वहां सरकार तभी बदल सकती है। जब नीतीश कुमार से बीजेपी का पूरी तरह मन बदल जाए। बीजेपी क्यों चाहेगी एक प्रदेश से अपनी हुक़ूमत गंवाना। और जबतक बीजेपी नहीं चाहेगी, बिहार में सरकार नहीं बदल सकती है। लालू प्रसाद यादव अब जोड़-तोड़ में बूढ़े हो चुके हैं। अमित शाह उनसे ज्यादा इस मामले में तेज़ हैं। वो तो फ्लोर टेस्ट में ही सरकार गिरा देंगे। और राज्यपाल आपको इतनी देरी कर दें कि आपके सारे के सारे मंसूबे धड़े के धड़े रह जाएं। दरअसल बीजेपी लालू प्रसाद यादव के ज़रिए एक खेल खेल रही है। और उस खेल में लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव मज़ाक़ के पात्र बनने वाले हैं।

 

ए आर आज़ाद

एक ही सूरत में बिहार में सत्ता परिवर्तन हो सकती है कि आरजेडी भारतीय जनता पार्टी को बाहर से या भीतर से समर्थन दे। उसके साथ सरकार में बराबरी के तर्ज पर रहे। तभी बिहार में सत्ता परिवर्तन संभव है। और तब आप कह सकते हैं कि लालू प्रसाद यादव मान चुके हैं कि अब उनके दोनों बेटों के बिहार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना क्षीण हो चुकी है। इसलिए उपमुख्यमंत्री का खेला खेल रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि बिहार में अभी सत्ता परिवर्तन का खेला होबो न।

 

बिहार की सियासत में गरमाहट लाने की कोशिश शुरू हो गई है। ख़बरों के ज़रिए बिहार में बदलाव की सुर्ख़ियां दिखाई जा रही हैं। यानी हम प्रमुख जीतन राम मांझी के ज़रिए एनडीए सरकार के ख़ात्मे का पैग़ाम दिया जा रहा है। यानी इसके सूत्रधार लालू प्रसाद यादव बने हैं। और उन्होंने अपने बेटे को फिर से डिप्टी सीएम बनाने की क़वायद शुरू कर दी है। तेजस्वी यादव और उनके दूसरे बेटे तेज प्रताप यादव को बिहार की राजनीति में फिर से खपाने की चाहत और ललक लालू प्रसाद यादव के अंतर्मन में गहरे तौर पर पैठ चुकी है। अब वो चाहते हैं कि बिहार में एक ऐसा खेला हो कि नीतीश सरकार दम तोड़ दे। इसके लिए उन्हें ‘मांझी’ मिल गया है। अब मांझी लालू प्रसाद यादव की सियासत की नैया को कैसे पार लगाते हैं, यह देखना सबके लिए दिलचस्प होगा। क्योंकि मांझी नीतीश कुमार के खड़ाऊं मुख्यमंत्री भी रहे हैं। जब लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने उन्हें ज़लील किया तो उन्होंने नीतीश का ही दामन थामा था। उस समय मायूस जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार ने सहारा दिया था। अगर जीतन राम मांझी में थोड़ी बहुत भी नैतिकता बची होगी तो फिर वह मुख्यमंत्री के प्रलोभन में कुछ ऐसा नहीं करेंगे, जिससे उनकी रही-सही साख भी धुल जाए।

बहरहाल बिहार में नई सरकार बनाना फिलहाल किसी के हाथ में नहीं है। और 2020 का नतीजा इतना पैक्ट है कि किसी के लिए भी उसमें सेंध लगाने की गुंजाइश ही नहीं है।

आंकड़े पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि एनडीए के पास कुल चार दल और 126 सीटें हैं। पहले 125 सीटें थी। लेकिन बाद में बीएसपी के विधायक ने जेडीयू ज्वाइन कर ली। इस तरह से नीतीश कुमार के दल में एक विधायक का इज़ाफ़ा हो गया। यानी नीतीश कुमार के पास अभी 44 विधायक हैं। ‘हम’ यानी मांझी के चार विधायक हैं। उसी प्रकार से वीआईपी के चार विधायक हैं। और बीजेपी के 74 विधायक हैं।

इधर महागठबंधन की बात करें तो गठबंधन में पांच दलों को मिलाकर 110 विधायक हैं। यानी आरजेडी के 75, कांग्रेस के 19, सीपीआई माले के 12, सीपीआई के 2 और सीपीएम के 2 विधायक हैं। सरकार बनाने का यहां जादुई आंकड़ा 122 है। यानी एनडीए के पास अभी 126 विधायक हैं। और महागठबंधन के पास 110 विधायक हैं। अगर लालू प्रसाद यादव मांझी को अपने पाले में ले आते हैं तो महागठबंधन के 114 विधायक होंगे। लेकिन फिर भी इससे बात नहीं बनती दिखती है। मांझी को अब वीआईपी को भी तोड़कर महागठबंधन में शामिल करना होगा। वीआईपी के चार विधायक हैं। वे आने से पहले सौदा करेंगे। हो सकता है कि वो डिप्टी सीएम का पद भी मांगे। लेकिन अगर वीआईपी को इस सौदे पर भी शामिल कर लिया जाए तो संख्या 118 ही पहुंचती है। ऐसे में चार विधायकों की और ज़रूरत पड़ेगी। और तब एनडीए में कोई ऐसे दल नहीं बचे हैं जिन्हें मांझी तोड़कर ला सकें। तब उनकी नज़र असद उद्दीन ओवैसी पर जाकर टिक सकती है। यानी उन्हें अगर असद उद्दीन ओवैसी से हरी झंडी मिल गई हो तो उनकी पार्टी एआईएमआईएम के पांच विधायक महागठबंधन के साथ जुड़ सकते हैं। तब जाकर जादुई आंकड़ा को पार कर सकते हैं। लेकिन ऐसे हालात में कोई भी कभी भी सरकार को चलता करने की धमकी दे सकता है। यानी तब यह कहा जा सकता है कि बिहार में नई सरकार बनाने की जितनी भी खिचड़ी पका ली जाए, दाल गलने वाली नहीं है।

दरअसल वहां सरकार तभी बदल सकती है। जब नीतीश कुमार से बीजेपी का पूरी तरह मन बदल जाए। बीजेपी क्यों चाहेगी एक प्रदेश से अपनी हुक़ूमत गंवाना। और जबतक बीजेपी नहीं चाहेगी, बिहार में सरकार नहीं बदल सकती है। लालू प्रसाद यादव अब जोड़-तोड़ में बूढ़े हो चुके हैं। अमित शाह उनसे ज्यादा इस मामले में तेज़ हैं। वो तो फ्लोर टेस्ट में ही सरकार गिरा देंगे। और राज्यपाल आपको इतनी देरी कर दें कि आपके सारे के सारे मंसूबे धड़े के धड़े रह जाएंगे। दरअसल बीजेपी लालू प्रसाद यादव के ज़रिए एक खेल खेल रही है। और उस खेल में लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव मज़ाक़ के पात्र बनने वाले हैं।

बीजेपी एक साथ दो मोर्चे पर खेला करती है। पहला खेला है, लालू और तेजस्वी एवं मांझी के ज़रिए नीतीश के ग़ुरूर या कहें रुतबे को कम करना ताकि वे बीजेपी की शरण में पूरी तरह आ सकें। दूसरा खेला है- महागठबंधन का अल्पमत सरकार बनवा देना और फिर लालू के ही विधायकों को तोड़कर बीजेपी में शामिल करा लेना और पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार चलाना। लेकिन यह सब सोच तो सोच हो सकती है लेकिन हक़ीक़त नहीं। बिहार में सत्ता परिवर्तन फिलहाल आसान नहीं है। यह सबकुछ बीजेपी का ड्रामा है। उस ड्रामे में लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, जीतन राम मांझी आदि महज़ एक कलाकार हैं। और ये सारे के सारे नेता बिहार के पर्दे पर अभी कुछ दिनों तक तैरते नज़र आएंगे। कहीं कुछ होना नहीं है। हां, जबतक बीजेपी न चाह ले।

एक ही सूरत में बिहार में सत्ता परिवर्तन हो सकती है कि आरजेडी भारतीय जनता पार्टी को बाहर से या भीतर से समर्थन दे। उसके साथ सरकार में बराबरी के तर्ज पर रहे। तभी बिहार में सत्ता परिवर्तन संभव है। और तब आप कह सकते हैं कि लालू प्रसाद यादव मान चुके हैं कि अब उनके दोनों बेटों के बिहार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना क्षीण हो चुकी है। इसलिए उपमुख्यमंत्री का खेला खेल रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि बिहार में अभी सत्ता परिवर्तन का खेला होबो न।