विचार: दर्शन योग्यता और प्रतिभा को समझना जरूरी

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शंभू कुमार

जो ज्ञान विद्यालय और विश्वविद्यालयों से प्राप्त किया जाता है वह सामान्य परिस्थितियों में काम आकर जीविकोपार्जन का साधन बनता है, उसे योग्यता कहते हैं किंतु जब हम प्रतिकूल अभाव और असुविधा में रहकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण-भाव रखते हुए धैर्य  के साथ संघर्ष कर सफलता प्राप्त करते हैं, उसे प्रतिभा कहा जाता है, जो जीवन-क्रम की हर विपरीत परिस्थिति में काम आती है।

योग्यता सम्पन्न व्यक्ति से दुनिया उनके  बाह्य गुणों से आकर्षित होती है जबकि प्रतिभा संपन्न व्यक्ति से दुनिया की आत्मा ही सम्मोहित हो जाती है। योग्यता संपन्न व्यक्ति की उपस्थिति की सराहना तो आम बात है, किंतु प्रतिभा संपन्न व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी लोग उनके सदगुणों की सार्वजनिक सराहना करने से भी नहीं हिचकते हैं। और तो और उन्हें इतिहास भी याद करने को विवश होता है। अधिकांशत: योग्यता संपन्न व्यक्ति का चरित्र निरंकुश होता दिखता आया है। वहीं दूसरी तरफ प्रतिभा संपन्न व्यक्ति के शृगार की खुशबू उनकी सहजता, मधुरता और विनम्रता से सुवासित होती रहती है। ऐसा देखा गया है कि अधिकांश योग्यता संपन्न व्यक्ति औपचारिकता और भौतिकता में आकंठ डूबा रहता है। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति जीवन के मानवतावादी यथार्थ गुणों की सार्थकता को सिद्ध करते दिखता है।

जहां योग्यता संपन्न व्यक्ति से स्वजन, परिजन की भी शिकायतें आम रहती है। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति की सराहना उनके विपरीत विचारधारा के लोग भी मुक्त कंठ से करते रहते हैं। योग्यता संपन्न व्यक्ति का आदर्श भौतिकता और बाह्य आडंबरों का अनुकरण होता है। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति मानवीय गुणों और जीवन दर्शन का अनुसरण करते हैं।

किसी दार्शनिक ने मूल्यवान कथन को उद्धरित करते हुए कहा है कि ‘‘जो मूल्य देकर मिलता है बाजारों में उसको तो तुम खरीद लाओगे।

जो मिलता ही नहीं है पद, पैसों से

उसको जीवन में कहां से पाओगे’’

जब हम विवेक से सोचें तो अर्थ है, नहीं सोचा तो व्यर्थ है। कभी नहीं सोचा तो अनर्थ है अन्यथा मानव जीवन ही व्यर्थ है। जो उपस्थिति में याद करता हो वह ज्ञान और योग्यता है जबकि जो अनुपस्थिति में याद करने को मजबूर करता हो वह प्रतिभा है। गुण और ज्ञान वही सिद्ध है जिससे दूसरों का भला होता है। दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, वहीं सज्जन की विद्या ज्ञान और धन दान के लिए होता है। जहां विनम्रता सभी गुणों की जननी है। वहीं सरल, सहज व्यवहार सभी गुणों का सार है। ये सारे मानवीय  गुण एक प्रतिभावान व्यक्ति में मौजूद होता है। अधिकांश योग्यता संपन्न व्यक्ति इन मानवीय गुणों से कोसों दूर रहते हैं।

सांसारिक दृष्टिकोण से वह भले ही किसी कार्य को संपन्न कर ले लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से सत्कार्यों की संपन्नता का निर्वहन विरले लोग ही कर पाते हैं। योग्यता संपन्न व्यक्ति भौतिकतावादी दृष्टि से संपन्न हो जाते हैं और सराहना के पात्र भी होते हैं, लेकिन जीवन की मानवतावादी सोच से कोसों दूर रहते हैं। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति कार्य की सफलता के साथ साथ मानवीय गुणों से जीवन को धन्य भी कर लेते हैं, जिसे इतिहास भी याद रखता है। योग्यता संपन्न व्यक्ति अपने अस्तित्व के निर्माणकर्ता को भी आसानी से भूल जाते हैं। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति अपने जीवन के निर्माणकर्ताओं को सदैव याद रखते हुए उनकी भावनाओं का आजीवन सम्मान करते रहते हैं । और अपने जीवन के हर एक व्यक्ति का ऋण चुकाकर जीवन को धन्य कर लेते हैं। अत: यह अकाट्य सत्य है कि वही आध्यात्मिक है, जो कृतज्ञ है। वक्त पर पानी पिलाने वाले व्यक्ति का पलड़ा जीवन भर दूध पिलाने वाले पर भारी पड़ता है।

योग्यता और प्रतिभा के बीच के सूक्ष्म विभेद को शब्दाकार देते हुए किसी दार्शनिक ने कहा है कि जो सुविधा से प्राप्त होता है वह क्षणिक होता है, जो संघर्ष से हासिल होता है वह चिरस्थाई होता है। जो आसानी से मिलता है वह ज्यादा दिनों तक चलता नहीं और जो ज्यादा दिन चलता है, वह आसानी से मिलता नहीं। आम तौर पर देखा गया है कि योग्यता संपन्न व्यक्ति ज्ञान प्रधान जबकि प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति भाव और विवेक प्रधान होता है।

योग्यता संपन्न व्यक्ति क्षणिक सुख-साधन के लिए बेचैन दिखता है। वहीं प्रतिभा संपन्न व्यक्ति आनंद और परमानंद का मार्ग प्रशस्त करता हुआ जीवन धन्य करता है। इस प्रकार अधिकांश योग्यता सम्पन्न व्यक्ति भले ही किसी भी प्रतिष्ठित प्रतियोगी आयोग के समक्ष अपनी योग्यता को प्रमाणित करते हुए पद और प्रभाव का अधिकारी बन जाते हैं किंतु प्रतिभावान व्यक्ति प्रकृति के मानवतावादी आयोग में उत्तीर्ण होकर इस नश्वर जीवन को धन्य कर लेता है।