दिल्ली की ये अजीबोगरीब कहानी

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अब उपराज्यपाल दिल्ली के Full-Fledged बॉस

ए आर आज़ाद

 

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22 मार्च, 2021 का दिन दिल्ली वालों के लिए कलंक का दिन था या सुनहरे अक्षरों से अंकित और टंकित होने वाला ऐतिहासिक दिन था, इसकी समीक्षा आने वाले दिनों में ही की जा सकती है। आज तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि इस दिल्ली के दिल पर एक चोट, एक वार, एक प्रहार किया गया है। जिस वार, चोट और प्रहार का असर एक लंबे अरसे तक रहेगा।दरअसल अब दिल्ली केंद्र के रहमोकरम पर रहेगी। दिल्ली सरकार का वजूद उसकी अस्मिता और उसकी पहचान को एक ही झटके में लोकसभा में पारित करके जोरों का झटका जोरों से दिया गया है। वैसे ही दिल्ली केंद्र शासित राज्य को  जमीन और पुलिस के मामले में पहले से ही पैदल कर दिया गया है। सीधी और सपाट बात करें तो सार्वजनिक व्यवस्था, ज़मीन और पुलिस के मामले में उसके हाथ पहले से ही बांध दिए गए थे।

 

अब लोकसभा में उपराज्यपाल की शक्तियां बढ़ाने वाला विधेयक पारित हो जाने से दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री के लिए कुछ बचा ही क्या है? एक तरह से उन्हें जनप्रतिनिधि होते हुए भी, निर्वाचित होते हुए भी अपने फैसले को मनवाने के लिए एलजी की तरफ टकटकी निगाहों से देखना होगा। यहां उपराज्यपाल का आशय आप केंद्र सरकार से मान सकते हैं। क्योंकि उपराज्यपाल वही होंगे, जिनका संबंध और सरोकार केंद्र सरकार से मधुर होगा, विश्वसनीय होगा। कोई भी दिल्ली का उपराज्यपाल जब केंद्र में किसी और की सरकार हो और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में किसी और की सरकार हो तब वह अपनी ओर से न तो निर्णायक भूमिका में होंगे और न ही पहल करने की भूमिका में होंगे। दरअसल केंद्र जो आदेश देगा, उस आदेश को बिना किसी ना-नुकुर किए मानना होगा। बिना किसी सवाल किए उसे अमली जामा पहनाना होगा। और जरूरत पड़ी तो दिल्ली की तत्कालीन सरकार को परेशान भी करना होगा। और बात-बात में उन्हें रोकना, टोकना और झंझट लेने के लिए बाध्य भी करना होगा।

दरअसल लोकसभा से पारित यह विधेयक केंद्र सरकार की दिल्ली के लोगों पर एक मानसिक दबाव भी है कि वे उन्हीं को चुनें, जिनकी सरकार केंद्र में है। और अगर केंद्र व दिल्ली की अलग-अलग सरकारें होंगी तो दिल्ली का विकास संभव ही नहीं है। इसका सीधा मतलब है कि मौजूदा केंद्र सरकार की अगुवा बीजेपी को लगता है कि वह सब दिन केंद्र में रहेगी और दिल्ली पर उनका कब्जा होना एक दिवास्वप्न है। दोनों तरह की शंका-आशंका निराधार हैं। क्योंकि इस दिल्ली पर बीजेपी ने भी कभी अपना कब्जा जमाया था। मदन लाल खुराना और सुषमा स्वराज बीजेपी के दिल्ली सरकार मे मुख्यमंत्री रह चुके हैं। और जब दिल्ली में बीजेपी की सरकार थी तो केंद्र में दूसरे दलों की सरकार थीं। लेकिन आज कुछ वर्षों से जिस तरह से केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच नूरा-कुश्ती हो रही है,वैसा कभी देखने को नहीं मिला। केंद्र सरकार का, दिल्ली सरकार के प्रति कभी भी भेदभावपूर्ण रवैया नहीं रहा। लेकिन आज कभी-कभार ऐसा महसूस होता है कि दिल्ली के विकास का पहिया शीला दीक्षित के जाने के बाद जिस तरह थम गया है,उसमें कहीं न कहीं राज्य सरकार से ज्यादा या कमोबेश बराबर केंद्र की दिल्ली सरकार के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया भी जिम्मेदार रहा है।

आज केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। कल कोई और होंगे। और फिर किसी दूसरे दलों को जनता जब मौका देगी तो उनके मुख्यमंत्री कोई और होंगे। तो ऐसे में जिनकी भी सरकार होगी, वो अपने हिसाब से दिल्ली का उत्तरोत्तर विकास नहीं कर पाएंगे। कहीं न कहीं आनन-फानन में इस तरह से विधेयक को बहुमत के आधार पर लोकसभा में पारित करवाना गैर जरूरी भी लगता है और असहयोग की भावना भी झलकती है।

दिल्ली की बेबसी देखिए! जहां केंद्र सरकार भी है और केंद्र शासित प्रदेश भी है, बावजूद इसके देश की राजधानी का रूप-रंग और यौवन कहीं से झलकता ही नहीं है। दिल्ली अब तो या विधवा की तरह लगती है या फिर उस बुढ़िया की तरह जिसके बेटे अकूत संपत्ति के मालिक हैं और जागीर और साम्राज्य के बावजूद उसे नौकर-चाकर पर छोड़कर अमेरिका में बस गया हो।

दिल्ली की सड़कें कहीं से नहीं लगती है कि ये राजधानी की सड़कें हैं। लुटियन जोन को छोड़ दें तो हर पांच किलोमीटर के बाद की दिल्ली अलग तरह की लगेगी। न कोई कानून-व्यवस्था और न ही ट्रैफिक पर नियंत्रण। पूरी दिल्ली की ट्रैफिक-व्यवस्था एक उगाही के केंद्र के रूप में स्थापित हो चुकी है।

साफ-सफाई के मामले में दिल्ली आपको हैरत में डाल देगी। आपको कहीं से नहीं लगेगा कि आप देश की राजधानी में हैं। कागजों पर, अखबारों में और टीवी पर स्वच्छता अभियान दिखेगा जरूर लेकिन जब हकीकत के आईने के सामने आप खड़े होंगे तो आपके सामने दिल्ली की बदसूरत बदहाल सूरत ही नजर आएंगी।

अब जब दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल कर दिया गया है तो दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए बतौर दिल्ली के मुख्यमंत्री हाथ पर हाथ धर कर अपने कार्यकाल के पूरे होने का इंतजार ही करना होगा। और उन्हें या तो दूसरे सूबों में अपना पांव पसारना होगा या महत्वाकांक्षा के परवान पर चढ़कर केंद्र की सत्ता तक पहुंचना होगा।

बीजेपी को इस बिल का तत्कालीन जो लाभ मिल जाए लेकिन आने वाले दिनों में उसी के लिए यह गले का फांस बन जाएगा। क्योंकि केंद्र की सरकार  या किसी भी सूबे की सरकार क्यों न हो, वह बदलती रहती है। सरकार आती रहती है। सरकार जाती रहती है। वह अगर इस गुमान में है कि संविधान संशोधन के जरिए और लोकसभा के संख्या बल पर अपने लिए रास्ता बनाने के मार्ग पर बिना किसी अवरुद्ध के प्रशस्त है तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार है।

कोई भी बाशऊर आदमी इसे यानी कांग्रेस की इन बातों से सहमति जता सकता है कि यह बिल असंवैधानिक है। और राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण भी है। दरअसल 1991 में दिल्ली को केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया गया था। इस कानून के तहत ही दिल्ली की विधानसभा को कानून बनाने की संवैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार में ठनाठनी जग जाहिर है। मामला अदालत तक पहुंचा। और तब सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी, 2019 के अपने एक फैसले में कहा था कि विधायी शक्तियों के कारण उपराज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह से बंधे हुए हैं। वह सिर्फ 239 ए (ए) के आधार पर ही उनसे अलग रास्ता अपना सकते हैं। इस अनुच्छेद 239 ए (ए) का मतलब हुआ कि मंत्रिमंडल की किसी बात पर उपराज्यपाल को मतभेद है तो वैसे में राष्ट्रपति के पास वे मामला भेज सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि उप राज्यपाल राष्ट्रपति के फैसले को मानेंगे।

केंद्र सरकार बहुत कुछ बदल रही है। बहुत कुछ बदलना चाह रही है। और लगभग इन सात वर्षों में इसने बहुत कुछ बदल दिया है तो देश की राजधानी दिल्ली को भी बदल देना चाहिए। देश की राजधानी दिल्ली आबोहवा के ऐतबार से, विभिन्न राज्यों की पहुंच के ऐतबार से और देश की राजधानी के पैमाने के ऐतबार से भी दुरूस्त नहीं है। इस पर केंद्र सरकार और उसके मुखिया का ध्यान नहीं जाना, बहुत कुछ कहता है, चौंकाता है, चौंकन्ना करता है।