कौन थे इस महान शख्सियत के गुरु?

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ए आर आज़ाद

अब सवाल उठता है कि जीवन में इतनी शोहरत हासिल करने वाले और समाज के लिए लैंप पोस्ट बनने वाले डॉ.भीमराव आंबेडकर के गुरु कौन थे। दरअसल हम उन्हीं के कथनों को याद कर जान सकते हैं कि हकीकत में उनके गुरू कौन-कौन थे। एक बार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि उनका जीवन तीन गुरुओं और तीन उपास्यों में सफल बना है। उन्होंने अपना पहला गुरु तथागत यानी गौतम बुद्ध को बताया। अपना दूसरा गुरु उन्होंने संत कबीर को बताया। और उन्होंने अपना तीसरा और आखिरी गुरु महात्मा ज्योतिराव फुले को बताया। उन्होंने अपने तीन उपास्य यानी देवता का भी जिक्र किया। उन्होंने ज्ञान को पहला देवता माना। स्वाभिमान को दूसरा देवता करार दिया। और शील को अपना तीसरा देवता स्वीकार किया।

बहरहाल डॉ. भीमराव आंबेडकर का पूरा जीवन त्याग, तपस्या और जनमानस के लिए बेहतर से बेहतर करने में बीत गया। इस दौरान उन्होंने परिवार पर भी ध्यान दिया। उन्होंने दो शादियां की। पहली पत्नी रमाबाई का निधन 1935 में हो गया। उसके बाद 1948 आते-आते आंबेडकर भी कुछ बीमारियों से ग्रसित होने लगे। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में अपने इलाज के लिए डॉ. शारदा कबीर से मिले। और फिर एक डॉक्टर और एक मरीज़ का मेलजोल बढ़ता-बढ़ता शादी 15 अप्रैल को शादी में बदल गया। यानी 1948 में डॉ आंबेडकर ने डॉक्टर शारदा कबीर से दिल्ली में शादी कर ली। डॉक्टर शारदा कबीर ने शादी के बाद अपना नाम बदलकर सविता आंबेडकर कर लिया। माई साहब का 29 मई, 2003 को नई दिल्ली के मेहरौली में निधन हो गया। दरअसल 93 में मृत्यु की गोद में बैठने वाली माई साहब कोई और नहीं सविता आंबेडकर थीं। उन्हें लोग प्यार से कभी माई, कभी माई साहेब कहा करते थे।

और इस तरह संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने तीन अनमोल और अमूल्य गुरुओं गौतम बुद्ध, संत कबीर एवं महात्मा ज्योतिराव फुले की शरण में आकर एक ऐसी इबारत लिखी, जिससे देश क्या दुनिया ने उनका लोहा मान लिया। ज्ञान का अपार खजाना हासिल करने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर दुनिया के सामने एक ऐसी मिसाल बनकर सामने आ गए जैसी मिसाल देखने को जल्दी मिलती कहां है। उनके सोचने और समझने की शैली और उस सोच को मूर्त रूप देने का मन-मिजाज उनको और जानने के लिए मन-मस्तिष्क में बेचैनी जगाती है, उत्कंठा बढ़ाती है। इसलिए डॉ. भीमराव आंबेडकर को जानने और समझने के लिए आंबेडकर साहित्य और उनके स्वयं द्वारा लिखी गई सभी पुस्तकों को ध्यान से पढ़ना होगा, तभी हम वास्तविक रूप में अपने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को समझ सकते हैं।

और जब हम उन्हें समझने की कोशिश करेंगे तो उनके उन देवताओं पर भी हमारी नजर पड़ेगी, जिनके सहारे उन्होंने अपने कद का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा कर लिया। उन्होंने ज्ञान को देवता की संज्ञा दी है। यानी हमारे लिए भी ज्ञान प्रमुखता हो। हर मुश्किल घड़ी में भी ज्ञान को देवतातुल्य मानकर ज्ञान-अर्जन के पथ पर बढ़ते रहना चाहिए, चलते रहना चाहिए। बेबाक दौड़ते रहना चाहिए। और उन्होंने शील को भी देवता की संज्ञा दी है। स्वाभिमान ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है। आपके पास सबकुछ है और अगर स्वाभिमान ही नहीं है तो फिर आपका ज्ञान और आपका दर्शन सबकुछ व्यर्थ है। इसलिए स्वाभिमान मनुष्य का आंतरिक गुण भी होना चाहिए और वाह्य गुण भी। अगर डॉ. भीमराव आंबेडकर में स्वाभिमान नहीं होता तो शायद वह अपनी बिरादरी,अपने देश और अपने लोगों को विभिन्न कुरीतियों से उबार भी नहीं पाते और फिर कल तक भिवा के नाम से जाने जाने वाला छात्र डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसा बरगद का पेड़ भी नहीं बनता। कामयाबी के लिए शील पर ध्यान केंद्रित करना बेहद जरूरी है। इसलिए उनके तीनों देवता भी इंसान के लिए सही मायने में कामयाबी का एक बेहतर जरिया भी हैं। इस पर भी हमें और आपको ध्यान देना चाहिए।