मानव जीवन एक ईश्वरीय फल

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कवि राजेश शर्मा

अनेकों जन्म के पुण्यों का फल यह मानव शरीर है। यह ईश्वर की बनाई सबसे सुंदर कृत्ती है। सबसे सुंदर रचना और,सबसे सुंदर सर्जन है। यह मानव शरीर पाकर आप और हम सभी ही इस मानव सम्पूर्ण जगत का आनंद ले सकते है। और इसी शरीर के माध्यम से ईश्वर को पा सकते हैं।

खाना पीना,सुनना चिल्लाना,दौड़ना भटकना,अपनी संख्या को बड़ाना, लडना झगड़ना,मार काट यह पशुओं में भी होता ही है लेकिन ईश्वर ने इस सारी व्यवस्था से ऊपर उठकर जो सुविधा साधन  ओर शक्ति मानव को दी है वो प्रमाणित है कि ईश्वर की इच्छा यही रही होगी के मेरे बनाए इस संसार में  इंसान को में सबसे अच्छे स्वरूप में ,सबसे अच्छे महोल में ओर सबसे अच्छे रूप में देखूं।

तभी उसने हमें बोलने, गाने, हंसने, नाचने, समझने, समझाने, खेल, गीत-,संगीत, साहित्य, काव्य, अध्यात्म, जप, तप, ध्यान, योग, सहित बुद्धि का वो भंडार दिया है, जिसका उपयोग कर हम संपूर्ण जगत का हर विषय, हर क्षेत्र हर उस आंनद को जी सकतें हैं।

मानव  जीवन को जीने  कि संपूर्ण कला को सीखने ओर सिखाने के इस धरती पर अनेकों-अनेकों अवतार हुए हैं। जो जीवन के नियम, जीवन को जीने के साधन ओर जीवन को जीने की व्यवस्था के साथ सब कुछ दिखाकर, सिखाकर समझ-समझाकर गए हैं।

इस मानव शरीर रूप में मिली जिंदगी का हर एक पल कीमती  है। इस हर एक पल में आपको ऐसा जीना है, ऐसा कार्य करना है, या करते रहना है,  जिससे ईश्वर खुश हो। किसी भी रूप में आप इस मानव शरीर रूपी  सुख-सुविधा से युक्त इस जीवन का सदुपयोग कर अपने ईश्वर के कृपा पात्र बन सकते है ,उसकी प्रसन्नता के कारण बन सकते हैं।

हमारा प्रभु आंनद में हमे देख सके, यही उसकी प्रसन्नता है

सम्पूर्ण शरीर ईश्वर की भक्ती में लगा रहे, यही इस जीवन का उदेष्य हो। मस्तिष्क में सदेव उसकी छवि बनी रहे। वैचारिक व्यवस्था  सदेव उसकी बताई राह पर चलने की विचारधारा में डूबी रहे। आंखे सदेव उसी के दर्शन उसी का रूप हर और करे। मुख, जिव्हा उसी के नाम, भजन कीर्तन जप तप के लिए निरन्तर कार्यरत रहे। कंठ सदेव ही मंत्र उच्चारण करता रहे। हृदय  सदेव ही भगवान  का मंदिर बना रहे। हृदय स्थल पर केवल  उसी की भक्ति की शक्ति  का राज रहे। स्वार्थ ओर लोभ इसके नजदीक भी नहीं आ सके। परोपकार, करुणा ओर प्रेम की  जगमग- जगमग ज्योति सदेव मन  के आंगन में प्रज्वलित रहे। प्रसन्नता से भरा हुआ मन ही ईश्वर की पसंद का स्थान होता है। और जिस मन में ईश्वर विराजमान होता है वो मन समस्त विकारों से मुक्त होता है।

इस काल में सब कुछ बंद पड़ा है।  लेकिन आपकी ईश्वरीय शक्ति तो आपके अंदर ही है आपकी भक्ति की शक्ति तो आपके अंदर ही है। इस शक्ति को आप लुप्त  नहीं होने दें। रोजाना मन से  जाग्रत रखें।  यही समय है- हमे जाग्रत होकर रहने का। और मन के अंदर बेठे ईश्वर को उसके बताए नियमो का पालन कर खुश रखना ही हमारा कर्तव्य है। ईश्वरीय शक्ति को खुश रखने के लिए आप अपने आप को प्रसन्न रखें।

किसी को प्रसन्न रखने से ज्यादा कठिन है खुद को प्रसन्न रखना।  फिलहाल यह समय तो बड़ा कठिन है। मानो परीक्षा का ही समय है। इससे निपटने के लिए प्रसन्न रहना पड़ेगा। इसलिए मुस्कुराते रहिए।