हमारे साथ आइए समझिए रमज़ान को

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ए आर आज़ाद

रमजान मुसलमानों के लिए इस्लाम का पांचवां स्तंभ है। यानी जिस तरह मुसलमानों के लिए शहादत मतलब तौहिद अर्थात एकेश्वरवाद यानी शहादा पहला स्तंभ है, नमाज़ दूसरा स्तंभ है, जकात चौथा स्तंभ है और हज पांचवां स्तंभ है। ठीक उसी प्रकार से रोजा यानी सौम इस्लाम का तीसरा स्तंभ है। यानी रोजा इस्लाम के पांच स्तंभों में तीसरा यानी महत्वपूर्ण स्तंभ है। और यही वजह है देश व दुनिया के मुसलमान रमजान में तीस दिनों के रोजे को बेहतरीन इबादत की तरह अपनाते हैं। रमजान के दिनों को अपने लिए सबसे बेहतरीन दिन के तौर पर तस्ववुर करते हैं। इस एक महीने के दौरान अपनी हर तरह की बुराई पर काबू पाते हैं। यानी इस तीस दिनों के भीतर मुसलमान अपने आपको बदल देते हैं।

अगर उनमें बुरी से बुरी बुराई भी है तो उसे छोड़ देते हैं। इस महीने में एक अजीब किस्म की हवाओं में फिजाओं में घटाओं में और इंसान की अदाओं में बदलाव दिखता है। जिससे लगने लगता है कि इस्लाम का मुबारक महीना रमजान आ गया है। और इस रमजान के रंग में हर मुसलमान रंग कर कोयले से हीरे की शक्ल में बदल जाता है। उसमें इबादत की एक अनोखी जागृति पैदा हो जाती है। इस पूरे महीने में वह रोजा रखकर सिर्फ साढ़े चौदह घंटे से लेकर 22 घंटे भूखा-प्यासा ही नहीं रहता बल्कि भूख और प्यास की शिद्दत से बेफिक्र होकर, गाफिल होकर इबादत में इस तरह से लीन हो जाता है कि उसे पता भी नहीं चलता कि वह भूखा है या प्यासा है। इस भावना और ऐसा कहने का आशय वे लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने कभी रोजे रखे हों या कभी रोजेदार के करीब रहने का उन्हें मौका मिला हो। और जिन लोगों को ऐसा मौका नहीं मिला है, उनकी अनुभूतियों में अगर यह बातें न समाए पाए तो फिर भी इसका दोष उन्हें नहीं देना चाहिए क्योंकि वे तो जानते ही नहीं कि 15-22 घंटे के दरम्यान इंसान किस तरह खाने और पीने से बचा रह सकता है?

अक्सर रोजा के मायने तीस दिन से निकाला जाता है। लेकिन आपको बता दें कि रोजा हर साल तीस दिन का नहीं होता है। रोजा किसी साल तीस दिनों का होता है तो किसी साल 29 दिनों का। कभी लगातार तीन साल तक भी रोजा 30 दिनों का हो सकता है और कभी लगातार तीन साल तक रोजा 29 दिनों का भी हो सकता है।

हिंदी के उपवास को रोजा कहते हैं। रोजा- फारसी शब्द है। रोजा को अरबी में सौम कहा जाता है। इसलिए हिंदूस्तान में इन तीनों नामों से रोजा को जाना जाता है।