साहित्य अकादेमी

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देश के साहित्य को अपने समाज से लेकर दुनिया के बाशिंदों तक पहुंचाने के लिए एक समिति की ज़रूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी। इस तरह का प्रस्ताव अंग्रेज़ों के समय भी आया लेकिन इस प्रस्ताव को अमली जामा देश की आज़ादी के बाद पहनाया जा सका। नतीजतन    सरकार ने एक राय से तीन राष्ट्रीय अकादेमियों के गठन के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी।

एक साहित्य के लिए समर्पित संस्था बनी, दूसरी संस्था दृश्य-कला को आधारभूत ऊंचाई देने के लिए दृश्य-कला बनी। तीसरी संस्था में नृत्य, नाटक एवं संगीत को एक साथ शामिल कर लिया गया।

आज हम बात कर रहे हैं साहित्य अकादेमी की। इस साहित्य अकादेमी का गठन राष्ट्रीय पैमाने पर किया गया। इनमें विभिन्न भाषाओं को जोड़ा गया। इस संस्था की नींव 12 मार्च,1954 को पड़ी। और, तब से अब तक यह भारतीय भाषाओं का पोषक बनकर सामने खड़ी है। इसका गवाह दिल्ली का रविंद्र भवन है। यह भवन साहित्य अकादेमी के अलावा ललित कला अकादेमी और संगीत, नाटक अकादेमी की कला-प्रेमियों की कौतुहल एवं जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

साहित्य अकादेमी से समकालीन भारतीय साहित्य जैसी नामचीन पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार गौरवपूर्ण पुरस्कारों में शामिल है। साहित्य अकादेमी प्रत्येक वर्ष साहित्यिक कृतियों के लिए पुरस्कार प्रदान करती है। हिंदी सहित 24 भाषाओं में पुरस्कार प्रदान किया जाता है। साहित्य अकादेमी अनुवाद कला को भी साहित्य विधा का बेहतरीन अंग मानती है। यही वजह है कि साहित्य अकादेमी प्रत्येक वर्ष विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक अनुवाद में भी पुरस्कार प्रदान करती है, जिन्हें साहित्य अकादेमी की मान्यता प्राप्त नहीं है लेकिन उन भाषाओं के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वालों को भाषा सम्मान से भी विभूषित करती है। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्रदान करने की शुरूआत 1955 से की गई। पुरस्कार में ताम्र-पत्र, शिल्ड एवं नगद राशि प्रदान की जाती है। इस समय साहित्य अकादेमी पुरस्कार स्वरूप एक लाख रूपए प्रदान करती है। साहित्य अकादेमी की ओर से अनुवाद पुरस्कार, बाल साहित्य पुरस्कार एवं युवा लेखन पुरस्कार हर वर्ष भारतीय भाषाओं में प्रदान की जाती है। इन तीनों पुरस्कारों की सम्मान राशि इस समय पचास हज़ार है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार के दस प्रमुख लोगों में कई बड़े नाम हैं। साहित्य अकादेमी का पहला पुरस्कार 1955 में ‘हिम तरंगिनी’ काव्य के लिए माखनलाल चतुर्वेदी को प्रदान किया गया था। 1956 दूसरा पुरस्कार व्याख्या के लिए ‘पदमावत संजीवनी’ व्याख्या कृति पर वासुदेव शरण अग्रवाल को पुरस्कार से नवाज़ा गया। 1957 में दर्शन पर आधारित पुस्तक ‘बौद्ध धर्म-दर्शन’ के लिए आचार्य नरेंद्र देव को प्रदान किया गया।

अगले वर्ष यानी 1958 में इतिहास पर राहुल सांस्कृत्यान की पुस्तक- ‘मध्य एशिया का इतिहास’ को प्रदान किया गया था। पुरस्कार के पांचवें वर्ष ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर 1959 में रामधारी सिंह दिनकर को साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्रदान किया गया। दिनकर के बाद कविता संग्रह-‘कला और बूढ़ा चांद’ के लिए सुमित्रानंदन पंत को काव्य के क्षेत्र में यह सम्मान प्रदान किया गया।

फिर उपन्यास की बारी आई तो ‘भूले-बिसरे चित्र’ के लिए 1961 में भगवतीचरण वर्मा को यह पुरस्कार प्रदान किया गया। ठीक इसके दो वर्ष बाद 1963 में जीवनी के लिए अमृतराय को यह पुरस्कार प्रदान किया गया। उनकी   पुरस्कृत पुस्तक का नाम-‘प्रेमचंद:कलम का सिपाही है’। ‘आंगन के पार द्वार’ के लिए अज्ञेय को अगले वर्ष पुरस्कार प्रदान किया गया। कुछ बड़े नामों में डॉ. नगेंद्र हैं, जैनेंद्र कुमार हैं, अमृतलाल नागर हैं, हरिवंश राय बच्चन हैं। बच्चन को 1968 में काव्य-संग्रह- ‘दो चट्टानों’ के लिए तो अमृत लाल नागर को ‘अमृत और विष’उपन्यास के लिए, जैनेंद्र कुमार को ‘मुक्ति बोध’ उपन्यास के लिए और, डॉ. नगेंद्र को ‘रस सिद्धांत विवेचना’ के लिए साहित्य अकादेमी ने पुरस्कार प्रदान किया।

मैथिली भाषा में देश के तीन भाषाओं के मर्मज्ञ साहित्यकार आचार्य ़फज़लुर रहमान हाशमी को 1995 ‘डॉ. अबुल कलाम आज़ाद’ पुस्तक पर अनुवाद पुरस्कार तत्कालीन साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष प्रो. यू आर अनंतमूर्ति के हाथों नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशल सेंटर के सभागार में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना के सानिध्य में प्रदान किया गया।

इसी प्रकार से दूसरा मत के संपादकीय सलाहकार एवं हिंदी, अंग्रेज़ी और मैथिली भाषाओं के मर्मज्ञ साहित्यकार एवं     आईएएस अधिकारी मन्त्रेश्वर झा को ‘कतेक डार’ के लिए साहित्य अकादेमी ने साहित्य अकादेमी सम्मान प्रदान किया।

1962 का साल कुछ ऐसा रहा कि इस वर्ष साहित्य अकादेमी ने कतई कारणों से किसी भी लेखक को किसी भी विधा में कोई भी पुरस्कार प्रदान नहीं किया।

साहित्य अकादेमी का पैतृक संगठन भारत सरकार की कल्चर मिनिस्ट्री (संस्कृति मंत्रालय) है।

़गौरतलब है कि साहित्य अकादेमी के पहले अध्यक्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। 1963 में उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाया गया। उनके निधन के बाद 1964 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1968 में डॉ. जाकिर हुसैन साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष बने। 1993 में प्रोफेसर यू आर अनंतमूर्ति अध्यक्ष चुने गए। 2003 में गोपीचंद नारंग इसके अध्यक्ष हुए। 2008 से 2012 तक सुनील गंगोपाध्याय साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष रहे। 2012 में उनके निधन के बाद साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को प्रभारी अध्यक्ष बनाया गया। विश्वनाथ तिवारी विधिवत अध्यक्ष 18 फरवरी,2013 को बने और उनका कार्यकाल 2013 से 2017 तक रहा।  2018 में पुर्नगठित सामान्य परिषद ने  प्रो. चंद्रशेखर कंबार को 2018 से 2022 तक के लिए साहित्य अकादेमी का अध्यक्ष चुन लिया।

साहित्य अकादेमी की सत्ता को चलाने के लिए 99 सदस्यीय परिषद हैं। जो सामान्य परिषद कहे जाते हैं। इस परिषद में अध्यक्ष, वित्तिय सलाहकार भी होते हैं। और, पांच सदस्य भारत सरकार की ओर से मनोनीत होते हैं। केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 35 प्रतिनिधि शामिल किए जाते हैं। साहित्य अकादेमी से मान्यता प्राप्त भाषाओं के 24 प्रतिनिधि के अलावा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के 20 प्रतिनिधि, परिषद के आठ निर्वाचित प्रतिनिधि एवं संगीत, नाटक, ललित कला, भारतीय सांस्कृतिक संबंद्ध परिषद, भारतीय प्रकाशक संघ और, राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी  फाउंडेशन के एक-एक प्रतिनिधि साहित्य अकादेमी संस्था के सदस्य होते हैं।

आपके लिए जानना ज़रूरी है कि साहित्य अकादेमी पुस्तकें भी प्रकाशित करती है। अभी तक लगभग छह हज़ार से भी ज़्यादा पुस्तकों का साहित्य अकादेमी ने प्रकाशन कर लिया है। एक अनुमान के मुताबि़क साहित्य अकादेमी प्रत्येक 19 घंटे में एक पुस्तक का प्रकाशन कर रही है। पुस्तकों के प्रकाशन के साथ-साथ साहित्य अकादेमी की ओर से तीनों स्तर पर संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। यानी साहित्य अकादेमी क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठियों का आयोजन करती है। इस तरह के आयोजन साहित्य अकादेमी प्रत्येक वर्ष करती है, जिसकी संख्या पचास तक पहुंच जाती है। इसके अलावा हर साल साहित्य अकादेमी साहित्यिक सभा और कार्यशालाओं का भी आयोजन करती है। लेखक से मिलिए साहित्य अकादेमी का कार्यक्रम काफी चर्चित है।

साहित्य अकादेमी का अपना एक पुस्तकालय भी है। यहां का पुस्तकालय भारत के प्रमुख पुस्तकालयों में शुमार होता है। यहां भारतीय भाषाओं की सभी 24 भाषाओं की पुस्तकों का समावेष है। इस पुस्तकालय  को कंप्यूटरकृत कर दिया गया है।

ए आर आज़ाद