मोदी सरकार की हुई जयजयकार, छह साल में बैंकों के डूबे 47 लाख करोड़

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अखिलेश अखिल

ठगिनी राजनीति और मायावी नेता के जाल में जब लोकतंत्र फंस जाता है तब किसी तरह के सवाल की गुंज़ाइश नहीं रहती। जब राजनीति पर धर्म का आवरण चढ़ जाता है तब जनता के सारे सवाल ठिठक जाते हैं। धर्म की जहरीली राजनीति इंसान को पंगु और बेकार बना देती है और मूकदर्शक भी। धर्म के इस नशे में वह सरकार के साथ आगे बढ़ती जाती है और उससे  प्रतिवाद करता है उसे कुचलने की चेस्टा की जाती है। देशद्रोह और एंटी नेशनल जैसे शब्द भले ही सरकार के कारिंदे नहीं गढ़ते हों लेकिन धार्मिक राजनीति के शिकार लोग अपने ही समाज के लोगों को कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूकते। भारतीय राजनीति आज इस दौर से गुज़र रही है। एक तरफ धार्मिक राजनीति का बोलबाला है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र की कहानी गढ़ने वाले लोग है जिनकी आवाज नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ के सिवा कुछ भी नहीं है।

   ये तमाम बातें इसलिए कही जा रही है कि देश बर्बादी के कगार पर है लेकिन सरकार और सरकार समर्थक लोगों की आंखें नहीं खुल रही है। धार्मिक पाखंड का ऐसा चस्मा उसकी आंखों पर गया है जिससे कुछ भला बुरा दिखा ही नहीं। अभी हाल में ही रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने एनुअल स्टैटिकल रिपोर्ट पेश की है। इसमें नॉन-परफ़ॉर्गिंग एसेट यानी एनपीए का भी जि़क्र है। आरबीआई की रिपोर्ट कहती है कि बीते दशक (2011-20) में एनपीए, 8 लाख करोड़ से बढ़कर लगभग 9 लाख करोड़ हो गया है। याद रहे दशक की शुरुआत यानी साल 2011 में यह 1 लाख करोड़ भी नहीं था।

  आंकड़ों के विश्लेषण में जाए तब पता चलता है कि बीते दशक में 4 साल मनमोहम तो 6 साल मोदी     सरकार रही। मनमोहन सरकार के आख़िरी चार साल (2011-2014) के बीच एनपीए की बढ़ने की दर 175% रही, जबकि मोदी सरकार के शुरुआती चार साल में बढ़ने की दर 178% रही। प्रतिशत में ज़्यादा फ़कऱ् नहीं दिख रहा है, लेकिन इतना जान लीजिए कि मनमोहन ने एनपीए  को 2 लाख 64 हज़ार करोड़ पर छोड़ा था और मोदी राज में ये नौ लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। देश की सरकार अपने में मुग्ध है तो सरकार समर्थक जनता धार्मिक राजनीतिक ज़हर के नशे में चूर। देश दिवालिया के कगार पर है लेकिन  सबकुछ चलता दिख रहा है।

     बहुत सारे लोग तो एनपीए को जानते तक नहीं। और जानना भी नहीं चाहते। जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी बैंक से लोन लेकर उसे वापस नहीं करती, तो उस लोन अकाउंट को क्लोज कर दिया जाता है। इसके बाद उसकी नियमों के तहत रिकवरी की जाती है। ज़्यादातर मामलों में यह रिकवरी हो ही नहीं पाती या होती भी है तो न के बराबर। नतीजतन बैंकों का पैसा डूब जाता है और बैंक घाटे में चला जाता है। कई बार बैंक बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं और ग्राहकों के अपने पैसे फंस जाते हैं। पीएमसी बैंक  के साथ भी यही हुआ था, उसने एचडीआईएल  नाम की एक ऐसी रियल स्टेट कंपनी को चार हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का लोन दे दिया था, जो बाद में ़खुद दिवालिया हो गई थी।

    याद कीजिए उस दौर को जब-जब बैंक लुटेरों की पोल खुली थी और कई नामचीन लोग नीरव और माल्या जैसों के नाम सामने आए थे। सच यही है कि ये बैंक लुटेरे ने सरकारी बैंकों को खोखला कर दिया और देश से बाहर भाग गया। सरकार आजतक न इन्हें पकड़ पाई है और न दंडित कर सकी। देश के बैंको को लूटने वाले तमाम लोग आज की तारीख़ में दूसरे देशों में पनाह लिए अपना कारोबार करते दिख रहे हैं और सरकार से लड़ाई भी कर रहे हैं।

    साल 2020 में बैंकों का जितना पैसा डूबा उसमें 88% रकम सरकारी बैंकों की थी। कमोबेश पिछले 10 साल से यही ट्रेंड चला आ रहा है। सरकारी बैंक मतलब आपकी बैंक, इन्हें पब्लिक बैंक भी कहा जाता है। जब सरकारी बैंक डूब जाते हैं, तो सरकार या आरबीआई  इनके मदद के लिए सामने आते हैं, जिससे सरकारी बैंक ग्राहकों के पैसों को लौटा सकें।

 याद रहे आरबीआई  या सरकारी वित्तीय संस्थाएं सरकारी बैंकों को मदद के लिए जो रकम देती हैं, वह कहां से आती है? आपके जेब से। यानी आपका पैसा लेकर नीरव और माल्या जैसे लोग भाग जाएं, फिर बैंक आप ही की जमा पूंजी को आपके जरूरत पर देने से मना कर दे। फिर सरकार आपके ही पैसों से बैंक की मदद करे, तब जाकर कहीं आपको आपका पैसा मिले। है न कमाल की बात!

  जो मनमोहन अपने आखिरी के 4 साल में नहीं कर सके, उसे मोदी ने आने के साथ पहले ही साल कर दिया। 2010-11 से लेकर 2013-14 के बीच 4 सालों में, मनमोहन सरकार में 44 हजार 500 करोड़ रुपए का लोन राइट-ऑफ हुआ। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद पहले ही साल, यानी अकेले 2014-15 में 60 हजार करोड़ रुपए का लोन राइट-ऑफ़ हो गया। 2017-18 से तो जैसे मानो मोदी सरकार ने मेहरबान होने का बीड़ा ही उठा लिया हो। 2017-18 से लेकर 2019-20 के बीच, सिर्फ तीन सालों में मोदी सरकार में 6 लाख 35 हजार करोड़ से भी ज़्यादा का लोन राइट-ऑफ़ हुआ।

   अब आप सोच रह होंगे कि ये राइट-ऑफ़ क्या होता है? जब बैंकों को लगता है कि उन्होंने लोन बांट तो दिया, लेकिन वसूलना मुश्किल हो रहा है, तब बैंक ये वाला फंडा अपनाता है। गणित ऐसी उलझती है कि बैलेंस शीट ही गड़बड़ होने लगती है। ऐसे में बैंक उस लोन को ‘राइट-ऑफ़’ कर देता है, यानी बैंक यह मान लेता है कि इस लोन की रिकवरी अब नहीं हो पाएगी और अब इस लोन अमाउंट को बैलेंस शीट से ही हटा देना चाहिए। यानी गया पैसा बट्टे खाते में। एनपीए  होने के बाद वसूली की थोड़ी बहुत गुंज़ाइश भी रहती है, लेकिन राइट-ऑफ़ होने के बाद खेल ख़त्म।

यह खेल आज़ाद भारत का ऐसा खेल है जो जनता के सामने किया गया। कहते हैं कि भारत सोने की चिड़िया वाला देश था। इस देश को मु़गल लुटेरों से लेकर अंग्रेज़ों तक ने खूब लुटा। लेकिन आजाद भारत में सरकार से मिलकर देश के ही लुटेरों ने जितनी संपत्ति की लूट की, उतनी बड़ी लूट तो नादिरशाह और तुगलकों ने भी नहीं की।