कोरोना, बाबा रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति

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ए आर आज़ाद

कोरोना की दूसरी लहर ने विशेषकर भारतीय चिकित्सा पद्धति को हैरानी में डाल दिया। वैज्ञानिक आधार पर आधारित एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति भी कोरोना के मंज़र और उससे उत्पन्न परिस्थितियों को देखकर सांप सुंध गया। वह बेबसी के आलम में हैरतज़दा होकर देखती रह गई। वह वहां पर आकर ठहर गई, जहां से वायरल बुख़ार में तीन दिनों से लेकर सात दिनों तक पारासिटा मोल टेबलेट की सलाह दी जाती है। यही सलाह भर पर ही शायद केंद्रित रहकर रह गई भारतीय एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति। और तब बाबा रामदेव जैसे झोला छाप चिकित्सकों और देशी चिकित्सा पद्दति के सौदागरों को मौक़ा मिला देश को लूटने का। उन्होंने कोरोना की उत्पन्न परिस्थितियों का जमकर लाभ उठाया। इस कालखंड में ख़ूब चांदी काटी। और उस काली कमाई ने इतना धन इक्टठा कर लिया कि उन्होंने भारतीय एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति को ही नकारना भी शुरू कर दिया। ज़ाहिर सी बात है कि देश में एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति का जाल बिछा हुआ है।

उनकी अपनी यूनियन है। उनके अपने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन हैं। और इस एसोसिएशन का जाल सूबों से लेकर ज़िलों तक में फैला हुआ है। और जब इतना बड़ा संगठन और एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति के चिकित्सकों की भारी-भरकम कमाई और उनकी आलीशान क्लिनिकों का अपना रूतबा और उस रूतबा में चार चांद लगा देता है, उनकी एकता। वे कितने भी लुटेरे बन जाएं, उनका कोई बाल बाका नहीं कर सकता है। क्योंकि उनकी पैरवी और उनके पैरोकार पूर देश में फैले हुए हैं। उन्हें बचाने के लिए हर समय वे तैयार बैठे रहते हैं। यही वजह है कि बाबा रामदेव जैसे झोला छाप डॉक्टरों को भी एलोपैथिक चिकित्सा पद्दति के चिकित्सकों पर अंगुली उठाने का मौक़ा मिल जाता है। ऐसा नहीं है कि बाबा रामदेव जो कुछ भी बोलते हैं, वे ग़लत ही बोलते हैं। वे सही भी बोलते हैं लेकिन ख़ुद ग़लत काम करते हैं और दूसरों को नसीहतें करते रहते हैं, यहीं पर से उनकी विश्वसनियता घटती है। और वे ख़ुद अपने बयानों से आलोचना के शिकार हो जाते हैं। बाबा रामदेव ख़ुद कोरोना के नाम पर लोगों के साथ और देश के साथ ठगी की है। यही ठगी निजी अस्पताल और क्लीनिक ने भी की है। किसे आप अच्छा मानें और किसे बुरा। देश और जनता के लिए तो दोनों एक ही जैसे साबित हुए। यानी दोनों चोर-चोर मौसेरे भाई।