विरोधी दलों के नेताओं को अपने दल में लाने का मतलब

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सियासत में इन दिनों पलायन कर रहे नेताओं को शरण देने का एक चलन चल पड़ा है। जिन नेताओं से पार्टी गाली सुनती रही है, उन्हीं नेताओं को गले लगाने का और दिल में बैठाने का जज्बा इन दिनों जोरों पर है। ऐसा नहीं है कि यह काम सिर्फ बीजेपी ही करती रही है। दरअसल इस काम को कांग्रेस ने भी अंजाम दिया है और इस काम को तृणमूल कांग्रेस से लेकर आरजेडी, जनता दल यूनाइटेड से लेकर जितनी भी क्षेत्रीय दल हैं, सबों ने मिलकर इस कुप्रथा को एक सम्मानजनक प्रचलन बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

2014 के बाद इसमें गति आई। और इसे गति बीजेपी ने तो। नतीजे में थौक भाव में नेता और कार्यकर्ता इधर से उधर शिफ्ट होते रहे। इसे बीजेपी अपनी उपलब्धि मानती रही। और दूसरे दलों से आए नेताओं को अपने कुनबे का सदस्य बनाकर बीजेपी ने एक नई इबारत लिखने की कोशिश की। इस नई इबारत का ठहराव लंबे अरसे तक हो यह स्वाभाविक नहीं है। दरअसल जब आपके साथ कोई विचारधारा या सिद्धांत के तहत नहीं जुड़ता है तो समझ लीजिए कि आप में उसकी दिलचस्पी फौरी है। और जैसे ही उसकी दिलचस्पी आप और आपकी पार्टी से खत्म होने लगी, वह आपका दामन छोड़ देगा।

कांग्रेस का दामन छोड़ने के पीछे भी यही मर्म है। और कांग्रेस से बीजेपी और तृणमूल से बीजेपी में शामिल होने का और भी बीजेपी का दामन छोड़कर घर वापसी का मामला भी यही है। यानी कहने का गरज यह है कि जब किसी पार्टी विशेष से मोहभंग की स्थिति हो जाए तो समझिए घर वापसी तय है। आज बीजेपी से दूसरे दलों से आए नेताओं का मोहभंग होना शुरू हो गया है। यह स्थिति बीजेपी के लिए एक खतरनाक मोड़ पर आ गई है। अब बीजेपी को इस खेल को बंद कर देना चाहिए। वरना यह खेल बीजेपी का ही खेला कर देगी। बीजेपी के इस खेल का खेला पश्चिम बंगाल में हो गया है। बीजेपी अगर यह खेल बदस्तूर जारी रखती है, तो उसका खेला देशभर में सुनिश्चित है। इसलिए बीजेपी को यह तय करना है कि उसे खेल करना या अब खेल बंद कर देना है।

ए आर आज़ाद