राकेश टिकैत ने तोमर के बयान को सरकारी साहूकारी बयान बताया

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सरकार और किसानों के बीच संवादशून्यता

कृषि मंत्री के बयान से आहत हुए किसान संगठन

राजीव रंजन नाग

लगभग पांच महीने से सरकार और किसानों के बीच कोई संवाद स्थापित नहीं हो पाया है। जाहिर है कि इस संवादशून्यता की स्थिति से किसानों की चिंता सरकार को कितनी है? नतीजे में किसान संगठन अब भी सरकार से बातचीत करने को उत्सुक हैं। उनका सारा ध्यान देश में किसानों की समस्याओं को हल करने पर टिका है। और किसानों की बातचीत में दिलचस्पी और समस्या के समाधान के लिए तत्परता इस बात का सबूत है कि किसान संगठनों ने पिछले महीने यानी मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर नए सिरे से दोबारा बातचीत शुरू करने की पहल की थी। लगभग एक महीने के बाद भी कोई साकारात्मक सरकारी सहयोगात्मक रुख देखने को नहीं मिला। बस केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का एक बयान आया कि सरकार आंदोलनकारी किसानों से बातचीत करने को तैयार है। लेकिन चर्चा का मुद्दा तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने का नहीं होगा।

जाहिर सी बात है कि किसान संगठनों को यह सरकारी बयान रास नहीं आया। किसान नेता राकेश टिकैत ने पलटवार किया। और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के इस बयान को सरकार का साहूकारी अंदाज बताया।

गौरतलब है कि सरकार और किसानों के बीच यह तनातनी पिछले लगभग सात महीनों से जारी है। किसान संगठन और सरकार दोनों आरपार की लड़ाई में लगे हुए हैं। किसान की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द किया जाए। और सरकार की जिद है कि देश के किसान इन तीनों कृषि कानूनों को अपना लें। स्वीकार कर लें। नतीजे में तनातनी बढ़ी हुई है। किसानों को दिल्ली की सीमा पर चौकसी करते हुए छह महीने से ज्यादा का समय गुजर गया। इस दौरान उन्होंने सरकार के असंवेदनशीलता को भी देखा। पुलिस की क्रू रता को भी भोगा। कंपकपाती ठंड को भी खुले आसमान के नीचे सहा। कोरोना के कहर को भी करीब से देखा। इस बीच आंधी-तूफान और बारिश के थपेड़े से भी मुकाबला किया। और मई-जून की यानी जेठ की दोपहरी में तपते हुए मौसम को और उसके तापमान को भी सहन कर लिया।

जाहिर है कि आरोपों से लेकर इन तमाम चीजों के विष को अपने गले उतारने वाला किसान संगठन अब सरकार के सामने घूटने  कैसे टेके? यही वजह है कि किसान संगठन सरकार से दोबारा बातचीत शुरू करने पर ज़ोर दे रहे हैं। क्योंकि इन्हें लगता है कि बातचीत से ही यानी संवाद से ही समस्या का हल निकल सकता है।

दरअसल 21-22 जनवरी, 2021 तक ही सरकार और किसान संगठनों के दरम्यान बातचीत हुई थी। यह बातचीत लगभग 11 बार हुई। लेकिन उस बातचीत से जब कोई नतीजा नहीं निकला तो फिर 22 जनवरी, 2021 से लेकर अबतक संवादशून्यता की स्थिति जस की तस बनी हुई है।

किसान संगठनों के आंदोलनों के बीच कुछ ऐसे मामले सामने आएं, जिससे इन आंदोलन करने वाले संगठनोों के दामन पर कुछ दाग चस्पा कर दिए गए। किसान आंदोलनों के बीच हत्या, बलात्कार आदि के मामले शरारती तत्वों के जरिए किए गए कुछ कृत्य को किसान आंदोलन से जोड़ दिया गया। इस पर किसान नेता राकेश टिकैत का साफ मानना है कि जिसने भी यह कृत्य किया है, कानून उसको सजा देगा। यह उस व्यक्ति विशेष का निजी मामला है। इससे किसान आंदोलन का कोई लेना-देना नहीं है। उनका तर्क है कि मोदी सरकार में कई लोग मारे गए। डकैती हुई। बलात्कार हुए। हिंसा हुई। दंगे हुए। जगन्य अपराध हुए तो क्या इसका मतलब ये है कि इसकी जिम्मेदारी लेते हुए मौजूदा सरकार इस्तीफा दे देगी! कोई भी घटना घटती है तो उसके लिए अदालत है। और सजा का प्रावधान है।

उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि आप सरकार की मंशा को एक पुरानी कहावत के जरिए आसानी से समझ सकते हैं। एक पुरानी कहावत है कि पंचायत का फैसला तो मानूंगा लेकिन यहां से खूंटा नहीं हटाउंगा। खूंटा तो जहां है, वहीं रहेगा। सरकार यही बात कह रही है कि बातचीत तो होगी। लेकिन तीनों कृषि कानून पर चर्चा नहीं होगी। राकेश टिकैत ने साफ कर दिया है कि मुद्दे का समाधान होने तक वो नहीं हटेंगे, डटे रहेंगे।

उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अगर समय रहते हुए किसानों की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो  उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव में वे राजनीतिक मोर्चा बनाकर नई रणनीति तय करेंगे।

अब सवाल उठता है कि किसान और सरकार के बीच तनातनी से बीजेपी को नुकसान होता है या फायदा? इसे समझने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश को समझना होगा। दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश जाट बेल्ट है। जाट बहुल्य इलाका होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-वोट किसी भी दल के लिए बड़ा मायने रखता है। किसान आंदोलन के अगुआ राकेश टिकैत जाट किसानों के बड़े नेता माने जाते हैं। और इन्हें गन्ना किसानों का भी समर्थन प्राप्त है। और 2014-2019 लोकसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश यानी जाट बहुल्य इलाके से बीजेपी को काफी फायदा मिला। अब उनकी नाराजगी बीजेपी के लिए खतरे की घंटी साबित हो रही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)