राजद्रोह के क़ानून का नाता पुराना है

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राजीव रंजन नाग

राजद्रोह क़ानून का भारत से लगभग 161 साल पुराना रिश्ता है। 1857 के विद्रोह के बाद जब ब्रिटिश हु़कूमत की हर तऱफ से और हर तरह से आलोचना के स्वर मुखर होने लगे तो घबराई हुई ब्रिटिश सरकार ने दमन की नीति अपनाने के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ताबूत पर आ़िखरी कील ठोंकने की गरज़ से एक क़ानून का नाम दिया गया राजद्रोह।

आज जिस देशद्रोह और राजद्रोह की चर्चा हर ज़ुबां पर है, वह कानून आज भी भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पैनल कोड का एक हिस्सा है। धारा 124 ए पिछले 151 साल से कानून बनकर अंग्रेज़ी हु़कूमत से लेकर मोदी हु़कूमत तक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ज़ुबां पर एक कील ठोक रही है। दरअसल राजद्रोह कानून की शुरूआत 1860 में हुई। और एक दशक बाद 1970 में इसे पैनल कोड में शामिल कर दिया गया था। उस वक़्त भी अंग्रेज़ अपने ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों के ख़िलाफ़ इसी आईपीसी की धारा का इस्तेमाल करते थे।

 

आज भी मौजूदा सरकार अंग्रेज़ों के बनाए गए इस क़ानून का इस्तेमाल करने में कोई गुरेज़ नहीं कर रही है। आज़ादी के लड़ाई के दौरान देश के कई स्वतंत्रता सेनानियों एवं क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ इस आईपीसी की धारा का इस्तेमाल किया गया। आज भी स्वतंत्र देश की सरकार में इस आईपीसी की धारा का बेहिचक इस्तेमाल किया जा रहा है।

ग़ौरतलब है कि स्वंतत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को आईपीसी की इसी धारा में सज़ा सुनाई गई थी। महात्म गांधी को उनके लेख की वजह से राजद्रोह का आरोपी बनाया गया था। ठीक इसी प्रकार से 1908 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ लेख लिखने के जुर्म में राजद्रोह का मु़कदमा दर्ज किया गया था। और उन्हें छह साल की सज़ा भी सुनाई गई थी।

मौजूदा बीजेपी की सरकार में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, गुजरात के नेता हार्दिक पटेल, बिहार के नेता कन्हैया कुमार आदि को इसी क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था। ठीक इसी प्रकार से पिछले एक साल में चर्चित पत्रकार विनोद दुआ के अलावा आठ पत्रकारों के ख़िलाफ़ राजद्रोह के मामले दर्ज हुए।

नेशनल क्राइम रिपोर्टस ब्यूरो के मुताबि़क साल दर साल राजद्रोह के मामले घटने की बजाय बढ़ते हुए क्रम में सामने नज़र आने लगे हैं। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले मौजूदा सरकार में राजद्रोह के मामले पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि वर्ष 2014 में राजद्रोह के 58 मामले सामने आए। 2015 में राजद्रोह के 30 मामले दर्ज किए गए। 2016 में देशद्रोह के 35 मामले दर्ज हुए। इसी प्रकार 2017 में राजद्रोह के 51 मामले सामने आए। और 2018 के बाद तो राजद्रोह के मामले में सरकार की दिलचस्पी बढ़ने के साथ-साथ राजद्रोह के ग्रा़फ भी बढ़ने लगे। 2018 में राजद्रोह के 70 मामले दर्ज हुए। 2019 के आते-आते राजद्रोह के 93 मामले दर्ज हुए। और 2020 में तो राजद्रोह के मु़कदमे के मामले की संख्या बढ़कर 100 पार कर गई।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)