‘50 साल शासन’ दलित दिल से!

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ए आर आज़ाद

कांग्रेस जिस चीज़ को समझने में देर करती है, उस चीज़ को बीजेपी तुरंत लपक लेती है। बीजेपी के क़द्दावर नेता अमित शाह अपने 50 साला बयान के बाद मझधार से निकलने के लिए उनके पास जितने भी तरकश में तीर हैं, सबका इस्तेमाल कर लेना चाह रहे हैं। क्योंकि 2021 से लेकर 2024 का सफर उनके लिए और बीजेपी के लिए अहम है। अब अमित शाह की नज़र कांग्रेस की उस पुरानी पैटर्न पर है,  जिसके बल-बूते कांग्रेस इतने दिनों तक सत्ता पर ़काबिज़ होकर कभी बीजेपी की नींद हराम करती रही है और कभी उसके अरमानों और मंसूबों पर पानी फेरकर रुलाती रही है। अब बीजेपी के रणनीतिकार उसी ऐतिहासिक पैटर्न को गोद लेकर अपनी क़िस्मत का ताला खोलकर कांग्रेस को उसी तरह रुलाना चाहती है।

कांग्रेस का पुराना पैटर्न का एक ़फार्मूला रहा है। वह काफी कामयाब रहा। और किसी कारणवश कुछ वर्षों से कांग्रेस ने अपने सूत्र की अनदेखी कर दी। नतीजे में बीजेपी का आसमान छूता क़द सामने है। अब इसी सूत्र के ज़रिए बीजेपी के रणनीतिकार और योद्धाओं ने अपने उस महत्वकांक्षी मंसूबों को पूरा करने का ठाना है जिसके तहत लगातार पचास साल तक बीजेपी पंचायत से लेकर संसद तक सत्तासीन रह सके।

कांग्रेस से बीजेपी ने जो फ़ॉर्मूला लिया है, उसमें सि़र्फ इतना भर किया है कि समीकरण के बीच से एक पार्ट को हटा दिया है।

अब हम आपको कांग्रेस की कामयाबी का फ़ॉमूला बता दें। कांग्रेस की कामयाबी का राज़ कभी दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण वोट हुआ करता था। लेकिन जाने-अनजाने दलित और मुस्लिम वोट उनसे धीरे-धीरे खिसकते चले गए। ब्राह्मण वोट रहे भी और गए भी। इस समय कांग्रेस के पास यह फॉर्मूला अस्तित्व में नहीं है। इस मामले में की गई अपनी शोध के बाद बीजेपी के रणनीतिकार इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अगर दलित पर ़कब्ज़ा जमा लिया जाए तो फिर देश के कई हिस्सों पर फिर से ़काबिज़ हुआ जा सकता है। और पंचायत से लेकर संसद तक शासन करने की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया जा सकता है।

इस फ़ॉर्मूला में ब्राह्मण वोटर भी हैं। लेकिन बीजेपी को यह आभास है कि ब्राह्मण वोटर उसके साथ भी हैं और दूसरों के साथ भी हैं। ब्राह्मण वोट को तोड़ने और अपने हिस्से में करने में मोदी और अमित शाह की जोड़ी सक्षम रही है लेकिन दलित और मुसलमान इनके हाथों से रेत की तरह फिसलते रहे हैं। इसलिए बीजेपी के रणनीतिकार मुसलमान पर अभी दांव लगाना नहीं चाह रहे हैं। उनकी योजना में मुसलमान अगली कड़ी हो सकते हैं। अभी मुसलमान से ज़्यादा देश स्तर पर बड़ी जनसंख्या और संख्या वाले दलित हैं, जिन्हें अपने कुनबा में शामिल कर पार्टी को विस्तृत रूप और आकार दिया जा सकता है।

यह योजना किसी जाल की तरह बिछाई गई है। ताकि दलित को इस जाल में हर हाल में फांसा जा सके। योजना को तरतीब देने के लिए विधिवत और नीतिगत कार्यशैली का नुस्खा तैयार हो चुका है। इसके लिए बीजेपी और संघ ने साझे तौर पर योजनाबद्ध तरी़के से काम करना भी शुरू कर दिया है। योजना के मुताबि़क संघ और बीजेपी अपने ऐसे कार्यकर्ताओं का चयन कर रही है, जिसमें समर्पण हो। और जो इस मुहिम को अपना समय और साधन देकर समर्पित-भाव से उसे अंजाम तक पहुंचाने में जुट जाए और एक मिशन के तहत तीन-चार सालों तक लगकर ऐसा काम करे कि दलित भाजपा की मुट्ठी में हो।

इस काम में प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं को संगठन और संघ के लिए समर्पित होकर जुट जाने की सौगंध भी दिला दी गई है। एक प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं के ज़िम्मे एक हज़ार दलित पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। इन प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं का काम होगा इन एक हज़ार दलित वोटरों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को समझाना। और उनमें से ज़रूरत मंदों की एक लिस्ट तैयार कर सरकारी योजनाओं से लाभांवित कर अपनी तऱफ मु़खातिब करना मुख्य उद्देश्य में शामिल है।

इस काम में लगाए गए लोगों ने अगर अपनी ट्रेनिंग से मिली जानकारी के तहत समर्पण-भाव से अपने काम को अंजाम दे दिया तो बीजेपी के लिए दलित वोट पर ़कब्ज़ा करना कोई मुश्किल काम भी नहीं रह जाएगा। इसकी सा़फ वजह है कि दलितों का कोई अब बड़ा नेता नहीं रहा। मायावती के सियासत में हाशिए पर जाने के बाद दलित वोटर किसी एक पार्टी के बंधुआ मज़दूर बनकर नहीं रह गए हैं। वे मुसलमानों की ही तरह नेतृत्व विहीन बनकर अपने मन के मालिक बन बैठे हैं। इसी कालक्रम में ऊपजी परिस्थिति का फायदा बीजेपी लेना चाहती है।

बीजेपी के पाले में अगर दलित वोट आ गए तो ज़ाहिर है कि बीजेपी की स्थिति और बेहतर हो जाएगी। लेकिन यह योजना कितनी रंग लाएगी और दलित पर संघ और बीजेपी प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं का कितना असर कारगर होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन बीजेपी है कि सबकुछ अपनी मुट्ठी में कर लेने की ज़िद में सबसे आगे  बढ़ती ही जा रही है। और दलित पर दिमा़ग से क़ब्ज़ा जमाने के लिए उसके दिल पर हाथ रखने की कोशिश में पूरी तन्मयता के साथ जुट चुकी है।