सरकार की हेकड़ी से नहीं भागेगा कोरोना, यूपी सरकार को समझ में आनी चाहिए इतनी छोटी सी बात

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यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज से रात्रि कर्फ्यू का ऐलान किया। अब यूपी में वीकेंड में यानी शनिवार-रविवार रहेगा लॉक डाउन

ए आर आज़ाद

कोई भी सरकार अपनी हेकड़ी की बदौलत सत्ता को संचालित करने की परंपरा को अपना लेती है तो फिर जनमानस के बुरे दिन शुरु हो जाते हैं। तब सरकार को आईना दिखाने के लिए किसी न किसी को आगे आना ही होता है। उत्तर प्रदेश में ऐसा ही मामला योगी सरकार के आने के बाद से बदस्तूर जारी है। नतीजे में कोरोना विस्फोट देश के सामने एक भयावह रूप में सामने है। और इस मामले में यूपी की स्थिति और भी नाजुक है। और इसी नाजुक स्थिति को भांपते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार यानी योगी आदित्यनाथ की सरकार को जमकर फटकार लगाई है। यूपी सरकार की कोरोना पर उठाए जा रहे कदमों को नाकाफी मानते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के पांच शहरों में 26 अप्रैल तक के लिए लॉक डाउन लगाने का आदेश जारी कर दिया है। इस आदेश के बाद यूपी की योगी सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। अब इस सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस मानवीय और जनमानस के प्रति संवेदनशील फैसले को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। यानी जब दूसरे के बारे में कोई भी अदालत फैसला सुनाए तो उसका हृदय से स्वागत करने की नौटंकी करेंगे। लेकिन अगर वही फैसला उनकी सरकार के लिए हो तो वह उस फैसले को मानने से इंकार करेंगे और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। इस तरह के दो तरह के मापदंड की ट्रेनिंग शायद बीजेपी के नेताओं को मिली है।

दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला बहुत ही तर्कसंगत और मानवीय पक्ष को उजागर करता हुआ है। दरअसल जब सरकार कोरोना से लड़ने में असमर्थ है तो फिर लोगों को कब तक जान गंवाने दिया जा सकता है। इसका सीधा उपाय है लोगों को घर में रहने के लिए प्रेरित किया जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यही अपने फैसले से करना चाहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि सभ्य समाज में अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं है और लोग उचित इलाज के अभाव में मर रहे हैं तो इसका मतलब है कि समुचित विकास नहीं हुआ है। स्वास्थ्य और शिक्षा अलग-थलग हो गए हैं। मौजूदा अराजक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना चाहिए।

अब कोई भी अदालत सरकार की इससे ज्यादा क्या फजीहत कर सकती है। जाहिर है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी की योगी सरकार के मनमानेपन रवैए से क्षुब्ध है। इस सरकार ने अपने कार्यकाल में न तो स्वास्थ्य पर ध्यान दिया और न ही शिक्षा पर। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में इन दोनों चीजों का लोप सा हो गया है। और यह लोप अगर कोरोना नहीं आता तो शायद लोगों की नजर में भी नहीं आता। दरअसल यूपी की योगी सरकार ने विवादों के अलावा किसी विषय पर कुछ किया ही नहीं है। इसलिए अदालत को तो यूपी सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं को अराजक सेवा की संज्ञा देनी पड़ी। एक गैरतमंद सरकार के लिए इससे बुरी बात क्या हो सकता है कि उसी सूबे का हाईकोर्ट सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान ही नहीं उठाए बल्कि उसे अराजक भी कहे।

दरअसल योगी सरकार का कामकाज अराजक ही नहीं है। बल्कि उसके फैसले और फरमान तुगलकी भी हैं। इसका नजीर कोरोना के मामले में हाल के उनके फैसले पर आप गौर करें तो आपको कुछ अंदाज हो जाएगा कि योगी सरकार के फैसले कितने बचकाने हैं और कितने तुगलगी फरमान जैसे हैं?

कोरोना के मामले में कई सूबों में स्वास्थ्य की स्थिति और मौत का दायरा लांघता जा रहा है। नतीजे में वीकेंड कफ्र्यू के बाद दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सोमवार से एक हफ्ते के लिए लॉक डाउन लगा दिया है। यानी 26 अप्रैल तक दिल्ली में पूरी तरह लॉक डाउन है। लेकिन एक बृहद आवादी वाला राज्य और उस सूबे के मुखिया लॉक डाउन लगाने के लिए तैयार नहीं है। यह सरकार अपने हाईकोर्ट के फैसले मानने को भी तैयार नहीं है।

ऐसा लगता है कि यूपी सरकार लॉक डाउन के नाम पर अपना खजाना भरना चाहती है। लोककल्याण योजनाओं के तहत जनता को राहत देने के बजाय उससे मास्क के नाम पर लगान वसूल कर अपने सरकार के खजाने को मालामाल करना चाह रही है। ऐसा इसलिए भी कहना पड़ रहा है कि यूपी सरकार एक तरफ हाईकोर्ट के फैसले को मानने से इंकार कर रही है। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित पांच जिले- प्रयागराज (इलाहाबाद) लखनऊ, कानपुर, वारणसी और गोरखपुर में 26 अप्रैल तक पूर्ण लॉक डाउन लगाने का आदेश दिया है। लेकिन यूपी सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ को इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश मंजूर नहीं है। और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को मजाक बनाने की कोशिश की। बहरहाल यह कोशिश उनके लिए ही भारी पड़ सकते हैं। जरा इंतजार तो कीजिए।