विधान परिषद में डंप हुए शाहनवाज़

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वीरेंद्र यादव

भाजपा ने सुशील मोदी के इस्तीफ़े से रिक्त सीट पर शाहनवाज़ हुसैन को विधान परिषद में भेज दिया है। इससे उनके प्रशंसक यह मान बैठे हैं कि शाहनवाज़ हुसैन को बिहार सरकार में मंत्री भी बनाया जा सकता है। लेकिन भाजपा के पत्ते अभी खुले नहीं हैं। ज़ाहिर है यह रास्ता इतना आसान भी नहीं है। लेकिन राजनीति में कोई भी बात लंबे समय तक फिक्स नहीं रहती है। 

भाजपा नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन विधान परिषद के लिए चुन लिए गए हैं। इनके साथ वीआईपी के सर्वेसर्वा मुकेश सहनी भी भाजपा के समर्थन से विधान पार्षद बन गए हैं। विधान परिषद की दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव में शाहनवाज़ हुसैन और मुकेश सहनी उम्मीदवार बनाए गए थे।

ग़ौरतलब है कि विधान पार्षद व मंत्री विनोद नारायण झा विधान सभा के लिए चुन लिए गए थे। इस कारण उन्होंने काउंसिल से इस्तीफ़ा दे दिया था। इनका कार्यकाल डेढ़ वर्ष बचा हुआ है। मुकेश सहनी फिलहाल डेढ़ वर्ष के लिए निर्वाचित हुए हैं। सहनी राज्य सरकार में मंत्री हैं। मंत्री बने रहने के लिए उनका एमएलसी बनना ज़रूरी था। उधर पूर्व उपमुख्यमंत्री   सुशील मोदी के इस्तीफ़े से खाली हुई सीट के लिए शाहनवाज़ हुसैन चुने गए हैं। राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद सुशील मोदी ने परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया था। राजनीतिक रूप से शाहनवाज़ हुसैन को विधान परिषद में डंप कर दिया गया है।

शाहनवाज़ हुसैन और मुकेश सहनी के लिए परिस्थितियां अलग-अलग थीं। शाहनवाज़ हुसैन लोकसभा के लिए तीन बार निर्वाचित हुए। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे केंद्र्रीय मंत्री थे। 2014 में मोदी लहर के बावजूद वे भागलपुर लोकसभा का चुनाव हार गए। नतीजतन उनसे तिलमिलाया नेतृत्व ने 2019 में  उन्हें बेटिकट कर दिया था। भागलपुर की वह सीट बीजेपी हाईकमान ने बड़ी चालाकी से जदयू के कोटे में डाल दिया। अपनी ़फज़ीहत पर पर्दा डालने के लिए शाहनवाज़ हुसैन ने टिकट कटने का दोष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर डाल दिया। ज़ाहिर है उस समय इस बात को लेकर दोनों पार्टियों में मनमुटाव भी हुआ था। लेकिन जल्द ही मामला शांत हो गया।

इधर विधान सभा चुनाव के बाद बिहार में भाजपा का सत्ता-समीकरण बदला। सुशील मोदी की जगह तारकिशोर गुप्ता और रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। सुशील मोदी को राज्यसभा भेज दिया गया। विधान सभा चुनाव में एनडीए से कोई भी मुसलमान उम्मीदवार विधायक नहीं बन सके। नतीजतन राज्य मंत्रिमंडल में मुसलमानों को जगह नहीं मिल सकी। भाजपा ने सुशील मोदी के इस्तीफ़े से रिक्त सीट पर शाहनवाज़ हुसैन को विधान परिषद में भेज दिया है। इससे उनके प्रशंसक यह मान बैठे हैं कि शाहनवाज़ हुसैन को बिहार सरकार में मंत्री भी बनाया जा सकता है। लेकिन भाजपा के पत्ते अभी खुले नहीं हैं। ज़ाहिर है यह रास्ता इतना आसान भी नहीं है। लेकिन राजनीति में कोई भी बात लंबे समय तक फिक्स नहीं रहती है।

वहीं दूसरी तरफ़ मुकेश सहनी भाजपा की स्टेपनी के रूप में एनडीए में शामिल हुए थे। विधान सभा चुनाव में भाजपा ने अपने कोटे की 11 सीटें वीआईपी को दीं। और साथ में 9 उम्मीादवार भी दे दिए। इसके साथ भाजपा ने एक सीट विधान परिषद में भी देने का वायदा किया था। विधान सभा चुनाव में मुकेश सहनी सिमरी बख़्ितयारपुर में हार गए, लेकिन भाजपा से उधार लिए चार उम्मीचदवार वीआईपी के टिकट पर चुनाव जीतने में सफल रहे। चार विधायकों के एवज़ में भाजपा कोटे से मुकेश सहनी राज्य सरकार में मंत्री बन गए। शपथ-ग्रहण के समय वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। छह माह के अंदर उन्हें विधानमंडल का सदस्य बनना ज़रूरी था। इसी दौर में विधान परिषद की दो सीटें खाली हो गईं। हालांकि इस समय राज्यपाल कोटे से मनोनीत होने वाली 12 सीटें भी रिक्त हैं। मुकेश सहनी राज्यपाल कोटे के तहत छह साल के लिए एमएलसी बनना चाहते थे। भाजपा नेतृत्व इसके लिए तैयार नहीं था। शुरू में कुछ दिन मुकेश सहनी अड़े रहे, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह की धमकी या समझाने के बाद वे डेढ़ वर्ष के लिए एमएलसी बनने को तैयार हो गए। भाजपा सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने एमएलसी बनाने का वायदा किया था। इसमें वर्ष की कोई शर्त नहीं थी। मुकेश सहनी की भी मजबूरी थी। उनके चारों विधायकों की आत्मा भाजपा के साथ है और वे काग़ज़ों पर वीआईपी के विधायक हैं। मुकेश सहनी की वजह से सरकार को कोई ख़तरा आया तो चारों भाजपा में शामिल हो सकते हैं। वीआइपी विधायक दल का तब तक ही अस्तित्व है, जब तक भाजपा चाहेगी। इस कारण मुकेश सहनी विधायकों के भरोसे संसदीय अधिकार की लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं। उन्हें भाजपा की अनुकंपा पर ही राजनीतिक अस्तित्व बनाए या बचाए रखना है।

मुकेश सहनी के राज्यपाल कोटे में मनोनयन के भी पेंच थे। उनकी शिक्षा ननमैट्रिक है। इसके साथ मनोनयन के लिए तय मानदंड पर खरे नहीं उतरते हैं। भाजपा ने इन्हीं आधारों की आड़ में मुकेश सहनी को डेढ़ वर्ष के लिए राज़ी होने पर विवश किया। फिलहाल मंत्री पद बचाए रखने के लिए उनका एमएलसी बनना ज़रूरी था। और अब दो साल तक मंत्री पद पर तकनीकी रूप से कोई ख़तरा नहीं है।

(लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)