आख़िर जुमला तो नहीं हो सकता 50 साल शासन!

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अदिलुर रहमान आज़ाद

क्योंकि पंचायत से लेकर संसद तक शासन करने का मंसूबा पाले अमित शाह के लिए इन चार वर्षों में बीजेपी शासित राज्यों को बचाना भी है और बीजेपी के हाथ से निकल चुके राज्यों को अपनी झोली में डालना भी उनके लिए ज़रूरी है। पांच में से पांच पर बीजेपी अगर क़ाबिज़ हो जाती है तो फिर कहा जा सकता है कि अमित शाह का यह कथन रंग लाया और अगर आधा-आधा या आधे से कम या ज़्यादा वाली स्थिति हुई तो फिर सोचा जा सकता है कि यह एक जुमला था। एक जुमला है और आगे भी एक जुमला बनकर ही रह जा सकता है।

कल्पना कीजिए सामने लोकसभा चुनाव का पहाड़ खड़ा हो और उस पहाड़ को पार करने की एक चुनौती पल-पल आपको विचलित कर रही हो तब आप अपने सिपहसालार के दायित्व को निभाते हुए उस चुनौती को लांघकर पार करने के लिए अपने सिपाहियों को क्या कहेंगे?

वह भी वैसी हालत में जब सिपहसालारों के सामने कार्यकर्ताओं की शिकायतों का पिटारा खुला हुआ हो और उसमें से पार्टी को लेकर जनमानस में चल रही उथल-पुथल की पूरी की पूरी पोटरी मौजूद हो तो फिर ऐसे में कोई भी सिपहसालार अपने सैनिकों यानी कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए जो कुछ भी कहेगा वह अतिशयोक्ति वाले ही शब्द होंगे।

ज़ाहिर सी बात है जब यह जुमला अमित शाह ने सितम्बर, 2018 में कहा तो 2019 का चुनाव उनकी आंखों में काजल की तरह समाया हुआ था। उनकी चिंता और चिंतन के बीच एक ऐसी बारी़क लकीर खींची थी, जिसे आसानी से समझना किसी के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी था।

दरअसल 2018 के आख़िरी दौर में बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की ‘इंडिया शाइनिंग’ भी डरा रही थी। पार्टी के हाथ से एक-एक कर हाथ आया सूबा तेज़ी के साथ जाता भी रहा था। राज्यों के खोने के डर का ़खौ़फ ज़हन से निकल भी नहीं पा रहा था कि कार्यकर्ताओं की फौज ने सरकार के फैसलों पर जनमानस की सोच को सही रूप में प्रदर्शित कर बीजेपी रणनीतिकार के चेहरे पर शिकन ला दिया था। यही शिकन बीजेपी के लिए उभरने और रास्ता खोलने का मार्ग बन गया। अमित शाह ने देर नहीं की और अपनी ‘फ़ौज’ को अतिशयोक्ति की एक ऐसी डोज दे दी, जिससे बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश आ गया। और देश में एक हलचल शुरू हो गई।

सियासत का स्वर कभी मंद्धिम नहीं होता है। उसके स्वर मुखर भी होते हैं और स्वर से एक माहौल का उदय भी होता है। और सही वक़्त पर सही चोट करने से सही परिणाम भी देता है।

ज़ाहिर सी बात है कि छह महीने के अंतराल में हुए लोकसभा के चुनाव में अमित शाह की यह अतिशयोक्ति पार्टी के लिए संजीवनी बूटी का काम कर गई। सरकार जाते-जाते रह गई और इसका उदय इस तरह से हुआ कि विदेशों में भारत का नक़्शा मोदीमय हो गया। हर तरफ़ से बीजेपी के गुणगान होने लगें और नरेंद्र मोदी तो शिखर पुरुष साबित हुए ही अमित शाह भी देश की नज़र में सियासत के नए चाणक्य के रूप में स्थापित हो गए।

अमित शाह में बीजेपी के लिए गोल करने की अदभुत शक्ति है। इसी शक्ति के कारण नरेंद्र मोदी उनकी पहली पसंद हैं। और उसी पसंद के तहत अमित शाह भी अपने मन की करने में कभी हिचकते नहीं हैं। वह कई बार ऐसे फैसले ले लेते हैं जिससे बीजेपी सकते और सदमे में आ जाती है लेकिन पार्टी और संघ की नज़र में उनके बढ़े ़कद से घबराए नेता अंदर ही अंदर  सबकुछ पचा जाते हैं। वह जानते हैं कि अमित शाह में माथे की शिकन को पढ़ने की अदभुत क्षमता है। और उन्हें पता है कि इस जोड़ी की मु़खाल़फत करने वालों का हस्र क्या होता है? उनके सामने बीजेपी के लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी हैं। वे किस तरह मोमबत्ती की तरह पिघले-पिघले नज़र आते हैं। अपने डॉयलॉग से सबको ़खामोश करने वाले शॉटगन बीजेपी बिन सब सुन की हालत में नज़र आ रहे हैं। विदेश व वित्त मंत्री जैसे महकमा को संभालने वाले यशवंत सिंहा मोदी और अमित शाह का विरोध कर अब तक स्थापित नहीं हो सके हैं। तो फिर अब बीजेपी में कौन से नेता ऐसे हैं, जो पार्टी को दिशाहीन कह सकें या पार्टी में अपनी स्थिति स्पष्ट करने की योग्यता रखते हों।

इसलिए बीजेपी में लगभग सब लोगों ने दोनों जोड़ी को तस्लीम करते हुए सत्ता और पार्टी में बने रहकर अपना भला करते रहने तक महदूद होकर मजबूर की तरह रहने लगे हैं। इन नेताओं की मजबूरी की चादर लंबाई में बस एक रूमाल की तरह ही है। ज़ाहिर सी बात है कुछ छुपता है, कुछ दिखता है। लेकिन सत्ता और सियासत की खाल मज़बूत होती है। इसका कोई उसपर असर नहीं पड़ता है।

इस साल यानी 2021, 22 से लेकर 2024 तक बीजेपी के लिए चुनौती है। और इस चुनौती से पार्टी के रणनीतिकार कैसे पार पाते हैं, सबकी नज़र उनपर टिकी हुई है। क्योंकि पंचायत से लेकर संसद तक शासन करने का मंसूबा पाले अमित शाह के लिए इन चार वर्षों में बीजेपी शासित राज्यों को बचाना भी है और बीजेपी के हाथ से निकल चुके राज्यों को अपनी झोली में डालना भी उनके लिए ज़रूरी है। पांच में से पांच पर बीजेपी अगर ़काबिज़ हो जाती है तो फिर कहा जा सकता है कि अमित शाह का यह कथन रंग लाया और अगर आधा-आधा या आधे से कम या ज़्यादा वाली स्थिति हुई तो फिर सोचा जा सकता है कि यह एक जुमला था। एक जुमला है और आगे भी एक जुमला बनकर ही रह जा सकता है।