तमिलनाडु अथ कथा?

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ए आर आज़ाद

तमिलनाडु दक्षिण और देश का एक महत्वपूर्ण राज्य है। यहां बीजेपी का अभी तक खाता नहीं खुला है। बावजूद इसके बीजेपी तमिलनाडु अपनी पार्टी को धार देने के लिए डीएमके और कांग्रेस पर वार कर रही है। 234 सीटों के लिए 6अप्रैल को मतदान है। यहां भी एक ही चरण में मतदान तय है। बाकी चुनावी राज्यों की तरह तमिलनाडु के विधानसभा का नतीजा 2 मई को निकलेगा।

इस चुनाव में दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, क्षेत्रीय दलों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर दिख रही है। बीजेपी, एआईडीएमके की पिछलग्गु बनकर राज्य में अपना खाता खोलने के लिए व्याकुल है। और यही वजह है कि सत्तारुढ़ एआईडीएमके ने बीजेपी के नब्ज को पकड़ लिया और महज 20 सीटें देकर बीजेपी को इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। सूबों में अपने पांव पसारने की महत्वाकांक्षी बीजेपी इस समझौते पर भी खुश है और तमिलनाडु में एआईडीएमके की सत्ता को बचाए और बनाए रखने की रणनीति में ऐन-केन-प्रकारेण से कूद पड़ी है।

डीएमके ने भी कांग्रेस को 25 सीटें देकर अपने पाले में और अपनी राजनीतिक तथा रणनीतिक घेरे में घेरने के लिए विवश कर दिया। पिछले विधानसभा चुनाव में आठ सीटें लाने वाली कांग्रेस इसबार 25 सीट से हर सीट को  जीत में बदलने की मनोकामना और महत्वाकांक्षा को लेकर मैदान में है। यहां सीपीआई और सीपीएम के साथ-साथ कई स्थानीय और क्षेत्रीय दल डीएमके और एआईडीएमके के सहयोगी बनकर सत्ता की मलाई चखने के लिए उत्साहित हैं।

सबसे दिलचस्प है कि तमिलनाडु में फिर एक बार फिर एक नए फिल्मी सितारा का उदय हुआ है। यानी तमिल और हिंदी फिल्मों के मशहूर नायक कमल हासन की अपनी नई पार्टी मक्कल निधि मय्यम  यानी एमएनएम बनाकर डीएमके और एआईडीएमके के गठबंधन के लिए परेशानी का सबब बनकर सामने है।

तमिलनाडु की राजनीति जयललिता और करुणानिधि के नाम से जानी जाती थी। लेकिन अब न तो जयललिता रहीं और न ही करुणानिधि। 2016 में जयललिता की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई। और 2018 में करुणानिधि ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 2016 के चुनाव में जयललिता के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 234 में से 136 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2016 के विधानसभा चुनाव में करुणानिधि की मौजूदगी में डीएमके 89 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। कांग्रेस को 8 सीटें मिली थीं। यानी डीएमके गठबंधन एक सौ का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया।

234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में सत्ता और सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को 118 सीटों की जरूरत पड़ेगी। यानी तमिलनाडु में सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा 118 है। तमिनलाडु में 6 करोड़ 26 लाख मतदाता हैं। पुडुचेरी की ही तरह यहां भी महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है।

इस चुनाव में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा था। तमिलनाडु की मौजूदा सरकार एआईडीएमके के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा इसलिए जोरों पर है कि सरकार में शामिल कई नेताओं के भ्रष्टाचार में संलिप्ता के आरोप हैं। विपक्ष ने इसे अपना हथियार बना लिया है। तमिलनाडु में एक अहम मुद्दा भ्रष्टाचार के अलावा नीट प्रवेश परीक्षा भी है। वहां के लोग मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए होने वाले नीट परीक्षा का खुलकर विरोध करते हैं।

इस चुनाव में जयललिता की मौत भी एक अहम मुद्दा बनकर सामने है। प्रमुख विपक्ष डीएमके ने कहा कि अगर वह सत्ता में आता है तो जयललिता की मौत की असली वजह सामने लाकर रख देंगे। दरअसल यह मुद्दा डीएमके के लिए इसलिए वरदान साबित होगा कि तमिलनाडु में जय ललिता का एक रसूख, रुतबा और सम्मान रहा है। उसी आदर-भाव के कारण जयललिता को पूरा तमिलनाडु अम्मा कहकर पुकारता है।

तमिलनाडु में आसमान छूती पेट्रोल की कीमत भी एक अहम मुद्दा था। और इस मुद्दे को डीएमके ने लपक लिया था। डीएमके ने कहा है कि वे पेट्रोल की कीमतों को टैक्स में कटौती करके कम करेगी।

करुणानिधि की मौत के बाद डीएमके की कमान करुणानिधि के बेटे स्टालिन संभाल रहे हैं। स्टालिन करुणानिधि के दूसरी पत्नी से और तीसरे बेटे हैं। स्टालिन ने 1984 में राजनीति में कदम रखा। लेकिन इस बार वे अपना पहला चुनाव हार गए। लेकिन उन्होंने चुनाव हारकर भी हिम्मत नहीं हारी। और अगली बार 1989 में उसी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत का सेहरा पहना। 1991 के चुनाव में वे फिर हार गए। और 1996 के चुनाव में जीत गए। स्टालिन ने चेन्नई नगर निगम के मेयर पद को भी सुशोभित किया।

पिता करुणानिधि की तरह साहित्य और फिल्मों में भी स्टालिन ने किस्मत आजमाई। लेकिन जब उन्हें लगा कि उनमें पिता सी प्रतिभा नहीं है तो उन्होंने साहित्य, फिल्म और टेलिविजन को अलविदा कहकर अभिनय से नाता तोड़ लिया। और सक्रिय राजनीति में अपनी सक्रियता दिखाई। 2018 में करुणानिधि के निधन के बाद सत्ता का स्वाभाविक रूप से हस्तांतरण हो गया। 2019 का लोकसभा चुनाव डीएमके ने स्टालिन के नेतृत्व में लड़ा और तमिलनाडु की 38 सीटों में से 37 सीटों को जीतकर एक नया इतिहास रच दिया।

जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएमके पार्टी दो हिस्सों में बंटकर रह गई। एक धड़े का नेतृत्व ओ पनीरसेलवम ने किया तो दूसरा धड़ा शशिकला के नेतृत्व में बना। यानी जयललिता की मौत के बाद शुरूआत में ओ पनीरसेलवम मुख्यमंत्री बने। और कुछ समय के लिए  शशिकला के नेतृत्व पलानीस्वामी भी मुख्यमंत्री बने। पलानीस्वामी ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ अंतराल में सरकार और पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया। अपनी दुरदर्शिता से उन्होंने अपने विरोधी पनीरसेलवम को भी अपने साथ मिला लिया। और शशिकला को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

दरअसल ये सारी घटनाक्रम सारी इसलिए हुई कि राज्यपाल ने शशिकला को शपथ दिलाने में कई दिनों तक इंतजार करवाया। और इसी बीच आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। जब फैसला आया तबतक जयललिता दिवंगत हो चुकी थीं। लेकिन शशिकला पर आफत टूट पड़ी। क्योंकि जयललिता और शशिकला को आय से अधिक मामले में दोषी करार दे दिया गया था। और उन्हें इस आरोप में जेल जाना पड़ा।

उन्होंने जेल जाने से पहले पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री के लिए चुना। उस वक्त शशिकला को यह गुमान भी नहीं था कि पलानी स्वामी मुख्यमंत्री बनते ही पार्टी को अपने नियंत्रण में ले लेंगे। और दूध की मक्खी की तरह उन्हें निकालकर फेंक देंगे। इस तरह से पलानी स्वामी ने तमिलनाडु की राजनीति में अपनी एक मजबूत जगह बना ली है।