July 22, 2026

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सांप्रदायिक-सौहार्द और भारतीय-दर्शन के साहित्यकार थे आचार्य हाशमी : डॉ अनिल सुलभ

आचार्य हाशमी बहुभाषाविद् विद्वान एवं सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक : डॉ. राजवर्धन आज़ाद

आज के दौर और वर्तमान परिवेश में आचार्य हाशमी सबसे अधिक प्रासांगिक : ए आर आज़ाद

20 जुलाई, 2026 को पटना में मनाई गई15वीं पुण्यतिथि

पांच मनीषियों को दिया गया आचार्य हाशमी ‘शिखर-सम्मान’

शानदार कवि-गोष्ठी एवं मुशायरा आयोजित

साहित्य अकादमी से पुरस्कृत, मैथिली, हिन्दी और ऊर्दू के मनीषी साहित्यकार आचार्य फ़ज़लुर्रहमान हाशमी न केवल सांप्रदायिक-सौहार्द के अप्रतिम उदाहरण थे, अपितु भारतीय-दर्शन के भी निपुण व्याख्याता थे। उन्हें पाली और संस्कृत का भी विशद ज्ञान था। भारतीय-दर्शन और वैदिक-साहित्य का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था। साहित्यिक मंचों के भी वे कुशल और लोकप्रिय संचालक थे। साहित्य अकादमी के सदस्य रहे आचार्य हाशमी की तीनों भाषाओं में विरचित 18 ग्रंथ उनके महान साहित्यिक अवदान के परिचायक हैं। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्हें मैथिली, हिन्दी और ऊर्दू के पाठक और साहित्यकार समान रूप से सम्मान देते थे। वे सच्चे अर्थों में एक राष्ट्रवादी मुसलमान थे।

यह बातें सोमवार 20 जुलाई, 2026 को, ‘इंस्टिच्युट ऑफ स्कौलर ट्रस्ट’ के सौजन्य से, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, आचार्य हाशमी की 15वीं पुण्यतिथि पर आयोजित स्मृति-सह-सम्मान समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि आचार्य हाशमी जैसे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक-पुरुष आज सर्वाधिक प्रासंगिक हैं। सौहार्द के ऐसे ही प्रतीकों से संसार में शांति स्थापित हो सकती है।

‘इंस्टिच्युट ऑफ स्कौलर ट्रस्ट’ के चेयरमैन, आचार्य हाशमी सांप्रदायिक सौहार्द मंच के अध्यक्ष, ‘दूसरा मत’ राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका के संपादक एवं 33 पुस्तकों के लेखक ए आर आज़ाद ने अतिथियों का स्वागत करते हुए आचार्य हाशमी की निपुणता का ज़िक़्र करते हुए कहा कि आचार्य हाशमी और आचार्य कुमुद विद्यालंकार देश के ऐसे दो महान साहित्यकार शख़्सियत हैं, जिन्हें वे दिल की गहराई से आदरणीय और अनुकरणीय मानते हैं। उन्होंने आचार्य हाशमी को याद करते हुए आगे कहा कि आज के परिवेश में जब सांप्रदायिकता जैसे ज़हर की खेती धड़ल्ले से हो रही है, तब आचार्य हाशमी साहब जैसे की प्रासंगिकता और ज़रूरत और बढ़ जाती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि आज के दौर और वर्तमान परिवेश में आचार्य हाशमी सबसे अधिक प्रासांगिक हैं। आचार्य हाशमी एक साहित्यकार के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक और अलमबरदार थे। उन्होंने जीवंत प्रयन्त हिन्दू-मुस्लिम एकता और देख की अखंडता के लिए काम किया। उनकी साहित्य रचना कई भाषाओं में पुष्प बिखेरती रही। वे साहित्य अकादेमी के वर्षों तक सदस्य, सलाहकार और अवार्ड समिति के सदस्य के साथ-साथ जूरी भी रहें। आज देश के नौजवानों और साहित्यकारों को उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक और रचनाधर्मिता में इंसानियत और मानवता को प्रोत्साहन देने वाले प्रतीक के रूप में देखना चाहिए। उन्हें पढ़ना चाहिए और इस दिशा में आगे ख़ुद भी बढ़ना चाहिए।

समारोह के मुख्य अतिथि, सुप्रसिद्ध नेत्र-रोग विशेषज्ञ एवं बिहार विधान परिषद के सदस्य डॉ. राजवर्धन आज़ाद ने कहा कि आचार्य हाशमी बहुभाषाविद् विद्वान थे। उन्हें जितना इस्लाम धर्म का ज्ञान था, उतना ही हिंदू धर्म का भी। इसका कारण यह था कि उन्होंने संस्कृत साहित्य के माध्यम से वैदिक धर्म का गहन अध्ययन किया था, जिसके लिए दरभंगा मिथिला विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘आचार्य’ की उपाधि से सम्मानित किया। उन्होंने साहित्य के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने आगे कहा कि हाशमी साहब के बेटे आज़ाद साहब और मुझमें काफी समानताएं हैं। पहली यह कि हम दोनों ही ‘आज़ाद’ हैं। लेकिन एक समस्या भी है कि बड़े बाप का बेटा होने से आपकी थोड़ी-सी आज़ादी कम हो जाती है, क्योंकि फिर हर कोई आपका मूल्यांकन इसी पैमाने पर करता है कि आप उनके पुत्र हैं। हमें अपनी विरासत को आगे बढ़ाना होता है, जिसके लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि हाशमी साहब ने साहित्य के लिए बहुत कुछ किया। हम सभी को, विशेषकर युवा पीढ़ी को, उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद करीमी ने आचार्य हाशमी की साहित्य-सेवाओं का स्मरण करते हुए कहा कि हाशमी साहब की रचनाएं विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी पढ़ाई जाती हैं। हाशमी साहब ने विद्यार्थियों को यह प्रेरणा दी कि वे अपनी प्रतिभा को बढ़ाएं। योग्यता और क़ाबिलियत ही इंसान को ऊंचा स्थान दिलाता है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत किया। और यही वजह है कि हम सब लोग आज उन्हें उनकी 15वीं पुण्य तिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए उनके मार्ग पर चलने की अहद कर रहे हैं।

 

बी डी कौलेज के प्राचार्य प्रो दिवाकर प्रसाद ने कहा कि आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी एक महान शख्सियत थे। वे हिन्दी, उर्दू, मैथिली, संस्कृत और पाली सहित अनेक भाषाओं के विद्वान थे। उनका सम्पूर्ण जीवन साहित्य, सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समर्पित रहा।

उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में प्रेम, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। ऐसे महान साहित्यकार, विद्वान और युगद्रष्टा व्यक्तित्व को मैं शत-शत नमन करता हूं।

किसान कॉलेज के प्राचार्य दिवांशु कुमार ने कहा कि आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी हम सभी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। हिंदू धर्म और संस्कृत पर उनका गहन ज्ञान हमें अचंभित भी करता है। और प्रेरित भी। वे धर्म के वास्तविक अर्थ और उसके मानवीय स्वरूप को समझने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अपने साहित्य और विचारों के माध्यम से सांप्रदायिक सौहार्द, प्रेम और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनके इस संदेश को आगे बढ़ाना हम सभी का दायित्व है।

उन्होंने आगे कहा कि हाशमी साहब के पुत्र ए आर आज़ाद साहब भी एक महान और ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्तित्व हैं। उनका व्यवहार अत्यंत सरल और सामान्य है। उन्होंने अपने आचरण से कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि वे इतने बड़े पत्रकार-साहित्यकार हैं और ऐसे महान साहित्यकार के पुत्र हैं। उनकी यही सादगी और विनम्रता मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है।

 

सोगरा कालेज, बिहारशरीफ के प्राचार्य डॉ एस. जी. मोहिद्दीन ने कहा कि आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और साझा विरासत के सच्चे संवाहक थे। हिन्दी, उर्दू और मैथिली के साथ-साथ संस्कृत पर भी उनका अद्भुत अधिकार था।

उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से हमेशा प्रेम, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवीय मूल्यों और सांप्रदायिक सौहार्द की स्थापना के लिए समर्पित किया। हमें उनके साहित्य का अध्ययन करना चाहिए और उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

दून पब्लिक स्कूल रमज़ानपुर, बेगूसराय के प्राचार्य श्री जी.के. सिंह ने अपने संबोधन में आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी की साहित्यिक हैसियत का मूल्यांकन करते हुए उनकी शख़्खिसत पर अपने अनमोल विचार पेश किए। उन्होंने कहा कि आचार्य हाशमी ने बेगूसराय का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया। उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार मिला। और उन्होंने हिन्दू, उर्दू, मैथिली और संस्कृत सहित कई क्षेत्रीय और प्रभावशाली भाषाओं में साहित्य को समृद्ध किया। उनकी साहित्य समृद्ध कला और उनके रचना कौशल का पूरा साहित्य जगत सम्मान करता है।

वे एक बड़े साहित्यकार थे। उनके शब्द जब बोलते हैं, तो उसमें दमखम होता है। उन्होंने समाज को पवित्र समाज बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए तन,मन और धन से काम किया। यही वजह है कि आज उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

 

जगत नारायण लाल महाविद्यालय, खगौल की प्राचार्या प्रो मधुप्रभा सिंह ने कहा कि आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी बहुभाषी विद्वान और विलक्षण साहित्यकार थे। हिन्दी, उर्दू, मैथिली, संस्कृत और पाली जैसी भाषाओं पर उनका समान अधिकार था।

उन्होंने विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संवाद और समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। उनका व्यक्तित्व जितना विशाल था, उतना ही सरल भी था। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से हमेशा मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया।

आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी के पौत्र और मेघ देवता के लेखक सैयद असद आज़ाद ने अपने संबोधन में कहा कि आज हम सब एक ऐसे साहित्य-मनीषी की पुण्यतिथि पर उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्र हुए हैं, जिनका संपूर्ण जीवन साहित्य, गंगा जमुनी तहज़ीब, राष्ट्रप्रेम और मानवीय मूल्यों की साधना को समर्पित रहा। वे केवल एक कवि या शायर नहीं थे, बल्कि विचारों के ऐसे साधक थे, जिन्होंने भाषा, धर्म और संस्कृति की कृत्रिम दीवारों को अपने लेखन से निरंतर चुनौती दी और अपनी लेखनी से मानवीय मूल्यों और सांप्रदायिक सौहार्द की अलख जगाई। मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूं आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी को।

आचार्य हाशमी उन विरल साहित्यकारों में थे, जिनकी पहचान किसी एक भाषा तक सीमित नहीं थी। हिन्दी, उर्दू और मैथिली—तीनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। संस्कृत और पाली का भी उन्होंने गंभीर अध्ययन किया था। भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद और पौराणिक साहित्य का गहन ज्ञान उनकी रचनाओं में सहज रूप से दिखाई देता है। इसी असाधारण विद्वत्ता के कारण दरभंगा मिथिला यूनिवर्सिटी ने  उन्हें “आचार्य” की उपाधि से नवाज़ा था।

अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए सैयद आज़ाद ने कहा कि आचार्य हाशमी ने राष्ट्रवाद को किसी संकीर्ण विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की समावेशी चेतना के रूप में देखा। उनकी रचनाओं में वेदों और उपनिषदों की गूंज है। उनका साहित्य कबीर की निर्भीकता , तुलसी की लोकमंगल भावना, निराला के यथार्थबोध, दिनकर की राष्ट्रीय चेतना, फ़िराक़ की संवेदना और गालिब के अंदाज़ ए बयां केा अद्भुत संगम  है।

हाशमी साहब के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज जब समाज अनेक प्रकार की वैचारिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, धार्मिक संकीर्णता का विष हमारे समाज में फैलता जा रहा है। ऐसे में आचार्य हाशमी का साहित्य समाज के लिए किसी एंटीडोट से कम नहीं है। उनकी  प्रसिद्ध कविता ‘हिंदू और मुसलमान’ इस कथन को प्रमाणित करती है। जिसकी कुछ पंक्तियाँ भी उन्होंने सुनाईं—

मन में हमारे सब के ख़ातिर आदर है औ सम्मान है।

हम ऐसे देश के बालक हैं जहां हिन्दू-मुसलमान है।।

जगतगुरु के निवासी हैं हम

और भारत मेरा देश है

जग को सिखलाया है हमने

वह साक्षी मेरा दिनेश है

किसी चीज़ की कमी नहीं है ज्ञान भी है और विज्ञान है।

हम ऐसे देश के बालक हैं जहां हिन्दू-मुसलमान है।।

महापुरुषों की यह भूमि है

जन्म लिये हैं यहां राम भी

‘वृन्दावन’ में बजती रहती

मुरली अब भी घनश्याम की

जो मन्दिर में बजता है शंख वही मस्जिद में अज़ान है।

हम ऐसे देश के बालक हैं जहां हिन्दू-मुसलमान है।।

आगे उन्होंने कहां की आज जहां हिंदू और मुसलमान के नाम पर लोगों को बाटा जा रहा है। लोगों में नफ़रतें फैलाई जा रहीं हैं, ऐसे में अगर हम सभी आचार्य हाशमी की इस कविता में निहित मूल अर्थ को आत्मसात कर लें, तो सभी फितने फसाद अपने आप ख़त्म हो जाएंगे। जिस हिंदू और मुसलमान के नाम पर लोगों को बांटा जा रहा है, असल में यही हिन्दू मुस्लिम एकता , गंगा जमनी तहज़ीब धारा हमारी पहचान है। हमारी ताक़त है। हमारी विशेषता है। हमें बस अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है। हमें अपनी सोच को आचार्य हाशमी और उन तमाम महापुरुषों की तरह विकसित करने की आवश्यकता है, जिन्होंने मानवता को ही पर्म धर्म माना।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आचार्य फ़ज़लुर रहमान हाशमी का व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, अध्ययन और अनुकरण का अमूल्य स्रोत बना रहेगा।

इस अवसर पर, बी डी कौलेज के प्राचार्य प्रो दिवाकर प्रसाद, जगत नारायण लाल महाविद्यालय, खगौल की प्राचार्या प्रो मधुप्रभा सिंह, किसान कौलेज, सोहसराय के प्राचार्य प्रो दिव्यांशु कुमार, सोग़रा कालेज, बिहारशरीफ़ के प्राचार्य डॉ एस. जी. मोहिद्दीन तथा दून पब्लिक स्कूल, बेगूसराय के प्राचार्य जी के सिंह को ‘आचार्य हाशमी शिक्षाविद शिखर-सम्मान’ से विभूषित किया गया। मंचस्थ अतिथियों ने सभी अभिनन्दित मनीषियों को, वंदन-वस्त्र, स्मृति-चिन्ह, प्रशस्ति-पत्र तथा दो हज़ार पांच सौ रूपए की सम्मान-राशि देकर सम्मानित किया।

सम्मान-समारोह के उपरांत एक कवि-सम्मेलन का भी आयोजन हुआ, जिसमें वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, वरिष्ठ शायर प्रो एहसान शाम, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा केसर जाहिदी, सिद्धेश्वर, शमा कौसर ‘शमा’, श्वेता ग़ज़ल, डॉ प्रशांत कुमार, मोईन गिरीडीहवी, पं गणेश झा, सदानन्द प्रसाद, डा अवधेश द्विवेदी, अर्चना भारती, डा सुषमा कुमारी, विभारानी श्रीवास्तव, चित्तरंजन भारती, नन्दन कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी काव्य-रचनाओं से समारोह को मधुमय बनाया।

सम्मेलन के प्रबंधमंत्री कृष्ण रंजन सिंह, वरिष्ठ व्यंग्यकार ईं बाँके बिहारी साव, इन्दुभूषण सहाय, डा अशोक प्रियदर्शी, रंजन कुमार अमृतनिधि, वीरेंद्र यादव, गणेश कुमार सिंह, सच्चिदानन्द प्रसाद आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।

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