साहित्य सम्मेलन में ‘हिन्दी साहित्य और लोक-चेतना’ का लोकार्पण

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मधेपुरा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और विद्वान समालोचक प्रो अमरनाथ सिन्हा हिन्दी के एक मनीषी आचार्य हैं। इन्होंने अपने साहित्य से शोधार्थियों के ज्ञान को समृद्ध कया। प्रो सिन्हा अपने साहित्यिक दायित्व के प्रति जागरूक और सतर्क रहे हैं।

यह उदगार 18 अगस्त को ‘हिन्दी साहित्य और लोकचेतना’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने व्यक्त किए।

अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के प्रधानमंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने किया। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य में लोकचेतना के जितने भी आयाम हो सकते हैं, वे सबके सब विद्वान समालोचक प्रो सिन्हा की लोकार्पित पुस्तक में आएं हैं।

लेखकीय वक्तव्य में प्रो सिन्हा ने कहा कि हिन्दी के विद्यार्थी और अध्यापक के रूप में अपने लम्बे जीवन में, हिन्दी के मध्यक़ालीन इतिहास का लगभग 40 वर्षों तक अध्ययन-अध्यापन किया। यह संकलन उन्हीं अनुभवों से उपजे आलेख हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य के महान इतिहासकार पं राम चंद्र शुक्ल का कहना था कि हिन्दी साहित्य का इतिहास, अन्य इतिहास की भांति सूचनाएं भर नहीं है, उसके संचित मूल्य भी है।

इस अवसर पर, लेखक के पुत्र शिशिर राजन, बाँके बिहारी साव, सुधीर कुमार सिन्हा, अनिल कुमार सिन्हा, शिवांग कुमार सिंह, अमीरनाथ शर्मा, दिगम्बर जायसवाल, अमन वर्मा, राहूल कुमार, आदि प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा कल्याणी कुसुम सिंह, डा मधु वर्मा, डा निगम प्रकाश नारायण, कुमार अनुपम, डा पुष्पा जमुआर, वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, शायर आरपी घायल, जय प्रकाश पुजारी, डा अर्चना त्रिपाठी, पारिजात सौरभ, ई अशोक कुमार, अर्जुन प्रसाद सिंह, डा ओम प्रकाश जमुआर तथा सिद्धेश्वर ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानंद पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रबंधमंत्री कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

ब्यूरो रिपोर्ट दूसरा मत