और भी बहुत कुछ हासिल करना बाक़ी है: सुश्री शुक्ला मिस्त्री

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भारत में महिलाओं के लिए एक मिसाल बनीं शुक्ला मिस्त्री

हर स्त्री एक मिसाल बनने की क्षमता रखती है: शुक्ला मिस्त्री

बरौनी रिफाइनरी की कार्यपालक निदेशक सुश्री शुक्ला मिस्त्री से दूसरा मत के संपादक ए आर आज़ाद की खास बातचीत

पश्चिम बंगाल के 24 परगना के सुंदरबन इलाके़ में स्थित बसंती नाम के गांव के ग़रीब परिवार में जन्मी शुक्ला मिस्त्री ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया। गांव में बिजली, सड़क और महाविद्यालय आदि नहीं थे। गांव बसंती एक द्वीप है, और, हर साल बारिश के मौसम में बाढ़ से ग्रस्त होता है। नाव के अलावा वहां कोई संचार का माध्यम नहीं था। गांव में केवल दो स्कूल थे, एक प्राथमिक और दूसरा माध्यमिक। आगे के अध्ययन के लिए शहर जाना होता था। बिजली और संचार के अभाव में उन्होंने बिना किसी ट्यूशन के गांव के स्कूलों में पढ़ाई की। पढ़ाई के लिए मिट्टी के दीये का इस्तेमाल करती थीं। बहुत दिनों तक किताबें ख़रीदने के लिए पैसे नहीं थे।

1979 में कक्षा दस की परीक्षा के बाद चाचा के घर कोलकाता गई और दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंकों के कारण अच्छे कॉलेज, लेडी ब्रेबॉर्न कॉलेज में भर्ती हुईं। 1981 में बारहवीं कक्षा पास की और बंगाल के संयुक्त प्रवेश परीक्षा के माध्यम से 1981 में बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज में इंजीनियरिंग करने का मौक़ा मिला। इसलिए बी. ई. कॉलेज, शिबपुर, हावड़ा के मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग में दाख़िला लिया। सुश्री मिस्त्री पढ़ने में मेधावी थीं। 1985 में इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, IIT, खड़गपुर में एम टेक ज्वॉइन किया लेकिन इंडियनऑयल में नौकरी मिलने पर आगे की पढ़ाई छोड़ दी। और परिवार और भाइयों की देख-भाल की, परिवार का ख़्याल रखा और, दोनों भाइयों की पढ़ाई और उनके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी पूरी की। वह अपनी गांव की पहली इंजीनियर हैं।

आपने इंडियनऑयल कब ज्वॉइन किया?

मैंने वर्ष 1986 में ग्रेजुएट इंजीनियर ट्रेनी के रूप में इंडियनऑयल ज्वॉइन किया।

करियर की शुरूआत आपने किस ओहदे से किया?

मैंने एक निरीक्षण इंजीनियर के रूप में हल्दिया रिफाइनरी से अपने करियर की शुरुआत की।

आपने इंडियनऑयल के किन-किन विभागों में काम किया?

निरीक्षण विभाग, इंजीनियरिंग सर्विसेज विभाग और बाद में इंडियन ऑयल की विभिन्न परियोजनाओं में काम किया। हल्दिया, पानीपत और बरौनी रिफाइनरीज़ में ब्राउन फील्ड से लेकर ग्रीन फाइलेड प्रोजेक्ट्स में काम किया।

आपने कमान संभालने की शुरूआत कहां से की?

महाप्रबंधक बनने के बाद 2018 से 2019 तक डिगबोई रिफाइनरी का मैंने नेतृत्व किया। फिर बरौनी रिफाइनरी की कार्यपालक निदेशक बनी।

यहां आप कब से ईडी के तौर पर कमान संभाल रही हैं?

2019 से आज तक इकाई का सक्षमतापूर्ण नेतृत्व कर रही हूं।

पढ़ाई-लिखाई का सिलसिला कहां से कहां तक पहुंचा?

बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय, शिबपुर, हावड़ा, पश्चिम बंगाल से मेटलर्जी में  इंजीनियरिंग के साथ-साथ मैंने आईसीएफएआई से व्यवसाय प्रबंधन में एक एडवांस डिप्लोमा एवं औद्योगिक रेडियोग्राफी और अल्ट्रासोनिक नॉन डिस्ट्रक्टिव परीक्षण में प्रमाण-पत्र भी हासिल किया है।

कहा जाता है कि आप इंडियनऑयल में पहली महिला निरीक्षण इंजीनियर के तौर पर जानी जाती हैं?

न केवल इंडियनऑयल में बल्कि भारतीय हाइड्रोकार्बन उद्योग में भी मैं पहली महिला निरीक्षण इंजीनियर रही। मैं निर्माण और कमीशनिंग के कठिन समय के दौरान कतर की परियोजनाओं में काम करने वाली पहली भारतीय महिला इंजीनियर हूं।

इतना ही नहीं 24×7 पारियों में काम करने वाली पहली महिला इंजीनियरों में से एक थी।

आपने एक महिला इंजीनियर के तौर पर गरिमापूर्ण कार्यों के निष्पादन से अपनी एक पहचान बनाई। इस पहचान का पुरस्कार आपको किस रूप में मिला?

इंडियनऑयल और इंडियन हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री में तकनीकी कौशलता और योगदान के लिए  कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं।  2016-17 के लिए पीएसई में उत्कृष्ट महिला प्रबंधक के लिए स्कोप उत्कृष्टता पुरस्कार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पेट्रोटेक सोसाइटी द्वारा पेट्रोटेक -2016 ओजस्विनी पुरस्कार, औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 2015 में डन एंड ब्रैडस्ट्रीट पुरस्कार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा एनपीएमपी बेस्ट वुमन एक्जीक्यूटिव अवार्ड- 2000, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा पेट्रोफेड बेस्ट वुमन एग्जीक्यूटिव अवार्ड 2000 से सम्मानित किया गया।

आपको खेल का भी शौ़क रहा है। किस खेल से आप प्रभावित हैं?

टेनिस और बैडमिंटन में मेरी गहरी दिलचस्पी है।

तो क्या यह शौकिया है या फिर कभी किसी प्रतियोगिता के स्तर पर जाकर खेला भी है?

पीएसपीबी के स्तर पर खेल चुकी हूं।

आपकी सफलता कोई राज़ है या कोशिश और जद्दोजहद का परिणाम?

कठिन परिश्रम और कभी न रुकने की चाहत ही आपको हर मुक़ाम तक लेकर जाती है। जब मैं क़तर गई थी, शायद किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक छोटी सी लड़की, अपने देश, अपने परिवार से हज़ारों मील दूर, रेगिस्तान में अनेक अरबियों के साथ अकेले ग्रास रूट प्रोजेक्ट पर काम कर पाएगी। उस माहौल में अकेली महिला होना, डर और गर्व दोनों का एहसास देता था। मुझे लगता है अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो करें, ज़्यादा सोचें नहीं। डर सभी को लगता है, पर जो डर और संदेह के आगे बढ़ता है, निश्चित रूप से सफलता उन्हें मिलती है।

आप देश की ख़ास महिलाओं में अपना स्थान रखती हैं। किसी भी महिला के लिए कामयाबी का सूत्र क्या है?

हमारे देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में महिलाओं को कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। हर जगह और हर समय लोग आपको ‘जज’ करते हैं। जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की थी, उस समय 24 ७ 7 घंटे शिफ्ट में काम करने वाली पहली महिला थी। लोगों को उस समय यक़ीन दिलाना कि मैं भी कर सकती हूं, बहुत कठिन था। फिर भी मैंने हार नहीं मानी। हिम्मत मैंने नहीं छोड़ी।  मेरा मानना है कि महिलाएं प्राकृतिक रूप से ज़्यादा सशक्त हैं, उन्हें इसका अहसास होना चाहिए। अगर लक्ष्य चुन लिया तो पीछे न देखें, आगे बढ़ें। रास्ता बन जाता है, हौसला होना चाहिए।

आप जो बनना चाहती थीं वो बन गईं या किसी ख़ास मुक़ाम तक पहुंचने का अभी भी इंतज़ार है?

अपने गांव में जब मैं लालटेन की रौशनी में पढ़ती थी, आंखों में कई सपने थे, पर सोचा नहीं था कहां तक पहुंच पाऊंगी! ग़रीबी को हमने काफी क़रीब से देखा था। सोचने पर लगता था कि इन सबसे बाहर निकलने का एक ही रास्ता है- पढ़ाई। सीमित संसाधनों के बावजूद, काफी मेहनत करके अपनी पढ़ाई पूरी की। यक़ीन था कि अपने बाबा (पिताजी) को ज़रूर गौरवान्वित करूंगी। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है, अब तो काफी कम समय बचा है, अभी और भी बहुत कुछ हासिल करना बाक़ी है।

आपने जब कुछ बनने का सपना देखा तो उस सपने को साकार करने में परिवार का कितना साथ मिला?

मेरे बाबा (पिताजी) गांव में पीड़ितों को दवाइयां देते थे, उससे जो कुछ मिलता था उसी से हमारा घर चलता था। मैं और मेरे दो छोटे भाई अपने गांव में संघर्ष करके पढ़ते थे। 10वीं के बाद की पढ़ाई गांव में नहीं होती थी, उसके लिए शहर जाना पड़ा। मेरे चाचा ने आर्थिक सहायता दी तो बारहवीं की पढ़ाई पूरी की और, फिर इंजीनियरिंग में दाख़िला लिया।

आप में लाजवाब जुनून और काम करते रहने की अद्भुत क्षमता है। यह संभव कैसे हुआ?

मैं शुरू से अपने आप को खेल-कूद से जोड़कर रखा। देर रात भी समय मिलता तो मैं जाकर बैडमिंटन और टेनिस खेलती थी। इससे मुझे ऊर्जा मिलती है।

बरौनी रिफाइनरी की कार्यपालक निदेशक बनकर कितना गौरवांवित हुईं?

मुझे गर्व है कि मैं भारत में किसी भी रिफ़ाइनरी यूनिट की पहली महिला यूनिट हेड बनी। पहले डिगबोई में और फिर बरौनी रिफ़ाइनरी में यह गौरव प्राप्त हुआ। अभी मंज़िलें और भी हैं।

क्या यह बताना पसंद करेंगी कि आपके जीवन का मूल आधार क्या रहा है। कौन सी ऐसी बिंदु है, जहां जाकर आप समझौता नहीं कर सकतीं?

ईमानदारी और मज़बूत नैतिकता। जो ग़लत है, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं। चुप रहना और नज़र अंदाज़ करना कोई विकल्प नहीं है। हर व्यक्ति को ईमानदारी से अपना-अपना काम करना चाहिए। कुछ कर जाना ही जीवन का सार है। यह जीवन अनमोल है। और आपको एक बार ही मिलता है। इसलिए हर वो मुक़ाम हासिल करें, जो आप करना चाहते हैं।

आप देश की महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?

यह अनुमान लगाया गया है कि महिलाओं की श्रम-शक्ति में 10 प्रतिशत की वृद्धि से 2025 तक भारत की जीडीपी में 770 बिलियन डॉलर का इज़ाफ़ा हो सकता है। इसका मतलब है कि अवसर बहुत बड़े हैं लेकिन विश्वास और जुनून बहुत अधिक होना चाहिए। समाज आज बहुत अधिक स्वतंत्र और खुला है। संभावित महिलाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार है। अब समय है कि आप पारंपरिक दीवारों से परे सोचे। आप स्वाभाविक रूप से अधिक मज़बूत और स्थायी हैं। अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी क्षमता का उपयोग करें। अपने आप का ख़्याल रखना मत भूलें। अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में निवेश करें।

क्या लगता है आपको भारत विश्वगुरु और सोने की चिड़िया फिर से बन सकता है?

बिल्कुल। पर उसके लिए हर भारतीय को प्रयास करना होगा। अपने अलावा दूसरों के बारे में सोचना होगा, मेहनत करनी होगी। वैसे भी भारत को आने वाले सालों में एक विश्व-शक्ति के रूप में जाना जाएगा। बढ़ती जीडीपी और 2050 तक 800 मिलियन से अधिक वर्किंग एज आबादी के साथ भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है।

आपकी नज़र में वो महिला शख़्सियतें कौन सी हैं, जिनसे हर महिलाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए?

आज कल तो इनकी कमी नहीं हैं। हर क्षेत्र में महिलाएं इतिहास रच रही हैं। चाहे वो डॉ. स्वाति मोहन हों, जिन्होंने मंगल ग्रह पर पर्सिवेयरेंस रोवर को उतारा, डॉ. भावना लाल जो नासा में कार्यकारी प्रमुख हैं, सुदीप्त सेन गुप्ता और अदिति पंत, जो अंटार्कटिका में क़दम रखने वाली पहली महिला बनीं। आज महिलाएं दुनिया को स्पष्ट रूप से बता रही हैं कि हमारा आकलन अलग तरह से नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि हम समान रूप से प्रतिभाशाली और सक्षम हैं।

आने वाली महिला पीढ़ी के लिए आपका सूत्र-वाक्य क्या होगा?

तुम में असीम शक्ति है। इसे पहचानो। उठो और, अपने सपनों को आकार दो। नया आयाम दो। हर स्त्री एक मिसाल बनने की क्षमता रखती है।

आख़िरी सवाल आपने दूसरा मत पढ़ा। पत्रिका कैसी लगी। कोई सुझाव?

आप काफी अच्छा कार्य कर रहे हैं। स्थानीय समस्याओं को थोड़ा हाइलाइट करें, इससे लोगों को काफी मदद मिलेगी।