शिव पूजन सहाय का क़द हिमालय को छूता था: डा अनिल सुलभ

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पटना।

फ़क़ीरी की ज़िंदगी जीने वाले हिन्दी के महान साहित्य सेवी आचार्य शिव पूजन सहाय का साहित्यिक व्यक्तित्व हिमालय की तरह ऊँचा था। गीतों के राज कुमार थे नेपाली। उनके गीत हिमशिखर से झरते हुए प्रखर प्रपात की तरह थे। इन दोनों साहित्य-मनीषियों ने हिन्दी का बड़ा उपकार किया। साहित्य के लिए जिए और साहित्य के लिए ही मरे।
यह बातें बुधवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह और गीत-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, शिवजी वर्ष 1950 से 1959 तक, कुल 9 वर्षों तक साहित्य सम्मेलन के परिसर में ही रहे। तब नवस्थापित ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ का कार्यालय, सम्मेलन-भवन में संचालित होता था और वे उसके संस्थापक मंत्री थे। उनका पूरा परिवार यहीं रहता था। वे दिन रात, हिन्दी भाषा, साहित्य और साहित्यकारों के उन्नयन के लिए लगे रहते थे। अपनी संपूर्ण ऊर्जा और आत्मा को उन्होंने हिन्दी के लिए लगा दी। यह साहित्य सम्मेलन का स्वर्णिम-काल था। देश भर के साहित्यकार आचार्य जी से दिखाने के लिए अपनी पांडुलिपियाँ लेकर यहाँ आते थे। वे हिन्दी साहित्य के जीवित ज्ञान-कोश व अद्भुत प्रतिभा के संपादक थे। उनके संपादन कौशल की कोई तुलना नही थी। कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र हों या कि ‘कामायनी’ जैसे महाकाव्य के रचयिता महाकवि जयशंकर प्रसाद, सभी अपनी पुस्तकें, प्रकाशन के पूर्व आचार्य जी से दिखा लेना आवश्यक समझते थे। उनके हाथों में संपादन की एक ऐसी क्षेणी-हथौड़ी थी, जिससे अनगढ़ साहित्य को भी तराश कर, आकर्षक और मूल्यवान बना दिया जाता था।
आरंभ में समारोह का उद्घाटन करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री डा सी पी ठाकुर ने दोनों मनीषियों को स्मरण करते हुए कहा कि हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ-साथ आचार्य शिव पूजन सहाय और कवि गोपाल सिंह नेपाली का बहुत बड़ा योगदान रहा है। एक का गद्य-साहित्य में और दूसरे का पद्य साहित्य में। हिन्दी के विकास का दायित्व सबसे अधिक बिहार का है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के उआपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने कहा कि भारत सरकार के ‘पद्म-भूषण’ सम्मान से विभूषित शिवजी और नेपाली जी, साहित्य और कला की दृष्टि से सर्वाधिक उर्वरा भूमि भोजपुर की उपज थे। शिवजी ने अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ कथा-साहित्य को अनेकों कृतियाँ दीं, जिनमे ‘देहाती दुनिया’ की साहित्य-जगत में बड़ी चर्चा हुई और उसे हिन्दी की पहली आंचलिक-कृति मानी गयी। साहित्य सम्मेलन के लिए यह गौरव का विषय है कि वे सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे और सम्मेलन भवन में रह कर हिन्दी की अविस्मरणीय सेवा की। उनके संपादन में प्रकाशित हो रही, सम्मेलन की शोध-पत्रिका ‘साहित्य’ राष्ट्रीय-स्तर पर शिखर पर प्रतिष्ठित थी। उसमें छपने के लिए देश भर के साहित्यकार लालायित रहते थे।
सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी बच्चा ठाकुर, मार्कण्डेय शारदेय तथा डा नागेश्वर यादव ने भी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।


इस अवसर पर आयोजित गीत-गोष्ठी का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि आरपी घायल, मशहूर शायरा तलत परवीन, कवि सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, डा शालिनी पाण्डेय, डा मीना कुमारी परिहार, अनिल कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने सुमधुर गीतों का सस्वर पाठ किया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
पत्रकार नरेंद्र देव, प्रकाशक जाय दीप जैन, अमन वर्मा, नरेश कुमार, नवल किशोर सिंह, दुःख दमन सिंह, श्रीबाबू, राहूल कुमार, न कुमार मीत,शैलेश कुमार समेत बड़ी संख्या प्रबुद्धजन उपस्थित थे।