पप्पू यादव को लेकर बिहार की सियासत गरमाई

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ए आर आज़ाद

बिहार की राजनीति इन दिनों नए सिरे से गरमा गई है। कोरोना की दूसरी लहर की आहट और उसकी रवानगी के बीच एक पहर ऐसा भी आया कि कोरोना पीड़ितों एवं कोरोना-काल पीड़ितों की सुध लेने वालों पर ही शामत आन पड़ी। बिहार में कोरोना-काल में किसी की मदद करना गुनाह है। और यह गुनाह बिहार के एक बड़े नेता ने कर दिखाया। पप्पू यादव के नाम से मशहूर बिहार के इस नेता ने नीतीश कुमार के निशाने पर आ गएं। हालांकि नीतीश कुमार से पप्पू यादव की सीधी कोई दुश्मनी नहीं थी। लेकिन नीतीश कुमार बिहार के मुखिया हैं और उनकी कलम और आदेश से बिहार में सबकुछ होता है। ज़ाहिर सी बात है कि उन्हीं के आदेश से पप्पू यादव को गिरफ़्तार कर लिया गया। दिन में आरोप लगा कोरोना-काल में लॉक डाउन के नियमों के उल्लंघन का, और रात होते-होते यह आरोप 30-35 साल पुराने एक मुक़दमें में बदल गया।

रात के लगभग ग्यारह बजे आनन-फानन में अदालत बैठी, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पप्पू यादव को जेल भेज दिया गया। उनकी तबियत नासाज़ हुई तो जेल से सीधे दरभंगा मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया।

पप्पू यादव की पत्नी और पूर्व सांसद रंजीता रंजन ने नीतीश कुमार पर हमला भी बोला, चेतावनी भी दी और विनती भी की। लेकिन नीतीश कुमार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगा। यानी नीतीश कुमार को जो करना था, वे कर गए।

मालूम हो कि पप्पू यादव बिहार के एक मशहूर नेता हैं। अपराधी छवि उनका अतीत है। और ग़रीबों की सुध लेना, मुसीबतों में उनकी मदद करना उनका वर्तमान है। कुछ सालों से दुखियों की मदद उनका शगल बन गया है। वे अब ग़रीबों की भलाई में अपना दिल लगाने लगे हैं। ग़रीबों की मदद और असहायों व पीड़ितों के लिए आगे बढ़कर जो भी संभव होता है, वे करते दिखते हैं। यानी राजनीतिज्ञों में, ख़ासकर बिहार के राजनीतिज्ञों में जनसेवा-भाव में उनका कोई सानी नहीं है। और यही परेशानी दूसरे राजनीतिज्ञ दलों समेत नीतीश कुमार को भी सताने लगी है।

नीतीश कुमार ने बीजेपी के कहने पर पप्पू यादव को निशाने पर लिया या आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के इशारे पर? बहरहाल पप्पू यादव को लॉक डाउन के बहाने गिरफ़्तार किया गया। और फिर गड़े हुए मुर्दा को ज़िंदा किया गया। एक पुराने केस में उऩ्हें सलटाने की कोशिश की गई। यानी 14 दिनों की हिरासत में भेजकर यह जता दिया गया कि पप्पू यादव जैसे अपराधी छवि के लोगों को हम जब चाहें, जैसे चाहें निपटा सकते हैं।

बहरहाल अपराधी छवि और अपराधियों को तो अवश्य निपटाना चाहिए। लेकिन जब कोई अपराधी लोकसभा का सदस्य भी वर्षों-वर्ष रहा हो और अपनी पार्टी बनाकर राजनीति कर रहा हो और विधिवत चुनाव लड़ता और लड़वाता रहा हो। और वे सारे काम एक राजनीतिक दल के प्रमुख के तौर पर कर रहा हो तो फिर लॉक डाउन के समय ही गिरफ़्तारी क्यों? यह एक यक्ष प्रश्न है। इसका जवाब बिहार के मुखिया नीतीश कुमार को जनता को देना है। यह सवाल जनता का है। पप्पू यादव तो बिहार की बाढ़ में भी जमकर लोगों और बाढ़ पीड़ितों की मदद की। फिर क्यों नहीं उस वक़्त पप्पू यादव को गिरफ़्तार किया गया?

दरअसल पप्पू यादव को गिरफ़्तार करने का वक़्त और बहाना ग़लत था। अगर उन्हें लॉक डाउन के उल्लंघन के आरोप में गिरफ़्तार किया गया तो इस पर केस बनने चाहिए थे। लेकिन जब लॉक डाउन के उल्लंघन  के मामले में गिरफ़्तार कर उन्हें पुराने केस में जेल भेजा गया तो सरकार की नीयत में खोट उजागर हो गई। किसी भी सरकार में इतनी तो शालीनता होनी चाहिए कि वह अपने ही तरह के दूसरे दलों के प्रमुखों के साथ एक सम्मानजनक व्यवहार करे। पप्पू यादव भी एक क्षेत्रीय पार्टी के प्रमुख हैं। वे भी कई बार सांसद रह चुके हैं। उनकी पत्नी भी कांग्रेस की सीनियर लीडर हैं। और श्रीमती रंजीता रंजन भी कई बार सांसद रह चुकी हैं। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार का नाटकीय तौर पर पप्पू यादव को गिरफ़्तार कराना, उनके क़द और उनके पद से मेल नहीं खाता है।