कोरोना के मद्देनजर दो सुबाओं की बीजेपी सरकार के सीएम ने हाईकोर्ट के फैसले को अंगूठा दिखाकर जनता के साथ आखिर खिलवाड़ क्यों किया?

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ए आर आज़ाद

बीजेपी शासित दो प्रदेशों पर हाईकोर्ट की नाराजगी अदालत के मानवीय पहलू और पक्ष के प्रति संवेदनशील होने की गवाही दे रहा है। भाजपा शासित प्रदेश गुजरात में कोरोना विस्फोट से हो रही तबाही और उस तबाही को छिपाकर संख्या कम बताकर अपनी जिम्मेदारी से भागती बीजेपी की गुजरात सरकार को गुजरात हाईकोर्ट ने पकड़ लिया है। उसे जमकर फटकार लगाई है। उसकी ऐसी की तैसी कर दी है। एक अच्छी सरकार का दावा पेश करने वाली गुजरात सरकार के लिए इससे ज्यादा अपमान की बात क्या हो सकती है?

दरअसल गुजरात के अहमदाबाद, सूरत और वड़ोदरा में कोरोना का सबसे अधिक प्रभाव लोगों की परेशानी का सबब बना हुआ है। वहां के लोग इतने अधिक प्रभावित हैं कि मौत और बीमारी दोनों की संख्या बढ़ती जा रही है। अस्पतालों के बाहर एंबुलेंस की कतारों में मौजूदगी इस बात का एहसास कराती है कि गुजरात में सबकुछ ठीक नहीं है। कोरोना को लेकर सरकार में कोई छटपटाहट नहीं है। सरकार निठल्ली सरकार की तरह हाथ पर हाथ धरकर बैठी हुई है। और यही सरकार की वस्तुस्थिति ने गुजरात हाईकोर्ट को चिंतित कर दिया है। नतीजे में खुद गुजरात हाईकोर्ट को जनता के लिए आगे आना पड़ा। और उन्होंने सरकार के कामकाजों की समीक्षा की तो पाया कि गुजरात सरकार की तैयारी तो कोरोना लेकर कुछ थी ही नहीं। कुछ है ही नहीं। और तब जाकर गुजरात हाईकोर्ट ने सूबे की रुपाणी सरकार को आड़े हाथ लेते हुए फटकार लगाई है।

दरअसल कोरोना की भयावह स्थिति से जिस तरह से गुजरात की रुपाणी सरकार लड़ना चाह रही है, उससे हाईकोर्ट सहमत नहीं है। हाईकोर्ट इसे नाकाफी मान रहा है। यानी गुजरात सरकार के मुखिया की कोरोना को लेकर कोई तैयारी ही नहीं है। इसलिए तो गुजरात हाईकोर्ट को यहां तक कहना पड़ा कि सरकार ने समय रहते उनके सुझावों पर काम नहीं किया। समय रहते गंभीर स्थिति पर काबू पाने के लिए कोई उपाए नहीं किए। और इसी वजह से गुजरात में हालात भयावह हो गएं। यानी गुजरात सरकार की सलाह पर ठीक उसी तरह से ध्यान रुपाणी सरकार ने भी नहीं दिया जिस तरह से यूपी में बीजेपी की सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर ध्यान नहीं दिया। उस फैसले को तरजीह नहीं दी। और उस फैसले की अहमियत समझने की जगह उस फैसले को ही चुनौती दे दी।