मानी के मायने

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भागलपुर की महान हस्ती ने दुनिया को कहा अलविदा

नहीं रहे सैयद शाह हसन मानी

15 दिसंबर, 1935 -18 अप्रैल,2021

ग़ुम हुआ भागलपुर का एक ध्रुवतारा

 

ए आर आज़ाद

जिसने भी सुना होगा, एक पल उसे भी यकीन नहीं हुआ होगा मेरी तरह। जब सुबह-सुबह छह बजकर 21 मिनट में खालिद चांद भाई का मैसेज आया कि सैयद शाह हसन मानी इस दुनिया में नहीं रहे तो यह सुनकर मैं बेचैन हो उठा। बाद में तफ्तीश करने पर पता चला कि देर रात उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें शहर के ग्लोकल हॉस्पिटल ले जाया गया। लेकिन कोई फायदा नहीं हो सका। वे इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। डॉक्टरों ने भी जब यह बात कही तो लोगों को यकीन हुआ कि अब मानी साहब इस दुनिया में नहीं रहें और वे 86 साल, आठ महीना, 7 दिन के बाद इस फानी दुनिया को अलविदा कहकर अल्लाह को प्यारे हो गए हैं। भागलपुर के पत्रकार अफाक असद आजाद साहब का भी मैसेज के कुछ ही मिनटों के बाद फोन आया और उन्होंने भी उनके न रहने की मुझे ख़बर दी। इस मैसेज और फोन के बाद हज़रत मख़दूम पीर सैयद शाह हसन मानी साहब के साथ हुई मुलाक़ात का सारा मंज़र आंखों के सामने एक-एक कर छाने लगा।

दरअसल सैयद हसन मानी साहब में एक ऐसी ख़ूबी थी, जो ख़ूबी फरिश्तों में ही हो सकती है। उनके अंदर किसी के लिए दिल में कोई मैल नहीं था। और उनकी ज़ुबां पर कोई शिकवा किसे के लिए नहीं। उन्होंने कभी किसी की शिकायत नहीं की। कभी किसी को छोटा नहीं समझा। अगर छोटा समझा तो उन्हें प्यार दिया। बड़ा समझा तो बेइंतहा इज़्ज़त दी। मुस्लिम हो या ग़ैर-मुस्लिम सबके मान-मर्यादा का हमेशा ख़्याल रखा। उनके चेहरे पर नूर बरसता था। और उनके साथ बैठकर बातचीत करने पर कई बार मुझे उनके अंदर की रूहानियत का एहसास हुआ। जब हसन मानी साहब ने मुझे एक पैड पर ख़ानक़ाह को लेकर अपने तस्वुरात का इज़हार करने को कहा, तो मैंने ख़ानक़ाह में जिस रुहानियत का एहसास किया, उस लेटर में उसका ज़िक़्र भी किया।

मेरे सामने एक-एक मंज़र आता जा रहा है। 2 मार्च,2021 को जब मेरी भागलपुर के नवगछिया स्टेशन से दिल्ली के लिए राजधानी थी, उस दिन ख़ानक़ाह में काफी देर तक जनाब हसन मानी साहब के साथ गुफ्तगू करता रहा। उन्होंने हमें ख़ानक़ाह से जुड़े सारे दस्तावेज़ दिखाएं, जो दस्तावेज़ बादशाह हिमायूं औऱ शहज़ादा सलीम जहांगीर की शाही फरमान उनके पास मौजूद थे। उन्होंने इन सारे फरमानों की बाइंडिंग और फ्रेमिंग भी इतनी खूबसूरती से कराई थी कि उसे देखकर दिल बाग़-बाग़ हो गया। उन्होंने आते वक़्त अपनी चार किताबें दी और इसकी समीक्षा भी ख़ुद से लिखने को कही। हमने भी उनसे वादा किया था कि मैं इसकी समीक्षा ख़ुद से लिखूंगा। लेकिन मुझे इतना एहसास भी नहीं हो पाया कि वो इतनी जल्दी हमें छोड़कर दुनिया से रुख़सत हो जाएंगे। आज मैं अपनी ही नज़र में शर्मिंदगी का शिकार हो गया हूं। क्योंकि पहली बार उन्होंने मुझसे कुछ कहा और मैं उनके जीते जी कर नहीं सका। यानी अब वो मेरी लिखी हुई समीक्षा पढ़ने के लिए ज़िंदा नहीं होंगे। बहरहाल मैं उनके वादों को बहुत जल्द पूरा करूंगा और उनकी एक-एक किताब को पढ़कर समीक्षा भी ख़ुद लिखूंगा और उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक उसे दूसरा मत में प्रकाशित भी करुंगा।

हम आपको बता दें कि यह हमारी मानी साहब से दूसरी मुलाक़ात थी। पहली मुलाक़ात 9 दिसंबर, 2020 में हुई थी। उस मुलाक़ात के दौरान तो उन्होंने पहली मुलाक़ात में ही मेरा दिल जीत लिया था। मैं उनकी सादगी और अपनेपन का मुरीद हो गया था। और तब मुझे पता चला कि इस इंसान में तो पूरी इंसानियत बसी हुई है। चेहरे पर चमक और बुज़ुर्गियत का लिबास और एहसास भी एक साथ देखने को मिला। बातों में नरमी और दिल जीतने की सिफ़त व हुनर अगर कोई सीखना चाहे तो उनसे सीख सकता था। वो एक ऐसे हमदर्द थे, जो सच्चे रहनुमा की तरह हमेशा रहनुमाई करने को तैयार रहते थे।

हमें पहली मुलाक़ात में भी उनसे खुलकर बात करने का मौक़ा मिला। कई उलझे हुए सवालों और देश के उन मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा करने का और उन मुद्दों पर उनकी राय जानने का मौक़ा मिला। वे हमेशा बेबाक अंदाज़ में बोलते थे। वे यह सोचकर नहीं बोलते थे कि इससे हमारा क्या नुक़सान हो सकता है और किसे बुरा लग सकता है। हां, उनकी बातों में किसी के लिए कोई बुराई छुपी हुई नहीं होती थी। वे इतने सच्चे और सादगी पसंद थे कि बड़ी से बड़ी चीज़ों को भी नज़र अंदाज़ कर देते थे। किसी भी तरह के ख़सारे पर भी कभी अपना मन मलीन नहीं करते थे। यही कमोबेश गुण उनके बड़े बेटे और अबके 15वें सज्जादानशीं शाह फ़ख़रे आलम हसन में भी देखने को मिलती है। बहुत कुछ यानी मन-मिजाज़ और लोगों से बेपनाह मुहब्बत का सबक़ शायद उन्हें भी अपने वालिद साहब से ही विरासत में मिला है।

पहली मुलाक़ात के दौरान यानी 9 दिसंबर,2020 की रात लगभग एक घंटे तक हमारी और हसन मानी साहब के बीच इंटरव्यू की शक़्ल में गुफ़्तगू होती रही। हर सवाल का उन्होंने बड़े ही बेहतर अंदाज़ में जवाब दिया। लेकिन अफसोस इस बात की है कि वह इंटरव्यू उनके रहते प्रकाशित नहीं हो सका। हम बहुत जल्द हसन मानी साहब के चाहने वाले, अक़ीदतमंद और उनके प्रशंसकों के लिए वह इंटरव्यू प्रकाशित करेंगे ताकि देश और दुनिया के लोग अपने चाहने वाले इस महान शख़्सियत के ख़्यालात के इज़ाहर से फिर एक बार रुबरू हो सकें। उनका यह आख़िरी इंटरव्यू बहुत जल्द आपके सामने आएगा, जिसे पढ़कर और सुनकर आप यह महसूस करेंगे कि वाक़ई वे एक बेहतर इंसान और फरिश्ते एक साथ थे।

आपको जानकारी दे दें कि उन्होंने मरने से क़बल चार किताबें भी लिखीं। पहली किताब- ख़ानक़ाह ए पीर दमड़िया भागलपुर के सज्जादानशीं का इजमाली ताअरुफ़। यह किताब हिंदी में भी ख़ानक़ाह ए पीर दमड़िया भागलपुर के सज्जादानशीं का संयुक्त परिचय के नाम से छपी। दूसरी किताब ताअसुरात बरा ए कुतुब ख़ाना पीर दमड़िया और तीसरी किताब फेहरिस्त मुख़तुआत कुतुब ख़ाना पीर दमड़िया के नाम से प्रकाशित हुई। चौथी किताब हज पर आधारित है, जिसका नाम रहनुमाए हज गाइड है। 300 पेज की यह किताब तक़रीबन 243 मुद्दों पर आपका मार्गदर्शन करता है। इन चारों किताबों का इजरा यानी विमोचन 27 फरवरी, 2021 को ख़ानक़ाह पीर ए दमड़िया के प्रांगण में राष्ट्रीय सूफी कॉन्फ्रेंस के दौरान देश की मशहूर दरगाहों के सज्जादनशीं और मौजूद सूफियों की मौजूदगी में बड़ी शान व शौक़त के साथ हुई।

हम आपको बता दें कि 15 दिसंबर, 1935 को पैदा हुए हसन मानी साहब 18 अप्रैल की देर रात यानी शनिवार की देर रात इस फानी दुनिया को अलविदा कहकर अपनी असली दुनिया के सफर पर निकल पड़े। सैयद शाह हसन मानी ख़ानक़ाह पीर ए दमड़िया शाह के 14वें सज्जादानशीं थे। सैयद शाह शर्फ़ आलम के बड़े बेटे हसन मानी 2005 से सज्जादानशीं की भूमिका में थे। दरअसल 3 जून, 2005 को उनके वालिद और 13वें सज्जादानशीं हज़रत मख़दूम सैयद शाह अली अहमद उर्फ़ शर्फ़ आलम का निधन हो गया था। तब से अबतक हसन मानी साहब ख़ानक़ाह के सज्जादनशीं थे। हालांकि उन्होंने 28 फरवरी को अपने बड़े बेटे शाह फ़ख़रे आलम हसन को 15वें सज्जादानशीं का ताज पहना दिया था।

हसन मानी साहब की पैदाइश भी भागलपुर में हुई और शुरूआती तालीम भी उन्होंने भागलपुर से ही ली। 1963 में उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए नदवातुल उलमा लखनऊ का रुख़ किया। 1969 तक यहां शिक्षा ग्रहण किया। फिर अलीगढ से अरबी में एम ए किया। उसके बाद जेएनयू और जामिया मिलिया इस्लामिया से भी शिक्षा ग्रहण की। फिर भागलपुर लौटे तो भागलपुर यूनिवर्सिटी से इतिहास में एम ए और एलएलबी भी किया। 1980 में मुंबई में प्रोग्रामिंग कोर्स किया। और इस कोर्स की बदौलत सऊदी अरब सरकार के रक्षा मंत्रालय में कंप्यूटर सेंटर प्रभारी के तौर पर तक़रीबन तीन सालों तक अपनी सेवाएं दीं।

हसन मानी साहब भागलपुर की एक हस्ती थे। उन्होंने भागलपुर की हमेशा सामाजिक रहनुमाई की। रुहानियत से सराबोर हसन मानी साहब ग़ैर मुस्लिमों के बीच भी काफी मशहूर थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया। उनकी यही सिफ़त देश के दूसरे मुस्लिम धार्मिक रहनुमाओं से उनकी एक अलग पहचान कराती है।

इस फानी दुनिया को अलविदा कहने वाले हज़रत मख़दूम पीर सैयद शाह हसन मानी साहब अपने पीछे पत्नी, दो बेटे और चार बेटियों को छोड़ गए हैं। बड़े बेटे सैयद शाह फ़ख़रे आलम हसन हैं और छोटे बेटे सैयद शाह हुसैन हैं। बड़े बेटे सैयद शाह फ़ख़रे हसन भागलपुर में रहते हैं और छोटे बेटे सैयद शाह हुसैन इंडिया से बाहर रह रहे हैं।

दूसरा मत परिवार की ओर से इस महान शख़्सियत, देश की धरोहर और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक सैयद शाह हसन मानी साहब को नम आंखों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनकी मग़फ़िरत की कामना और जन्नत में आला मुक़ाम मिलने की मनोकामना करते हैं।