वक़्फ़ पर मुसलमानों को ख़ुद की समीक्षा करनी चाहिए

ए आर आज़ाद
आज के तथाकथित मुस्लिम रहनुमाओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। उनकी कथनी और करनी में आज इतना बड़ा अंतर लोग क्यों देख रहे हैं, इस पर भी उन्हें ग़ौर करना चाहिए। उन्हें वक़्फ़ का मतलब अगर सरकार समझा रही है, तो उसे संजीदगी से समझना चाहिए।
हर कोई जब यह मान रहा है कि आज़ादी के कुछ दिनों के बाद से ही वक़्फ़ का बेजा इस्तेमाल होने लगा है। और आज तो नौबत यहां तक पहुंच चुकी है कि वक़्फ़ के निगेहबान उसे अपनी जागीर समझने लगे हैं। और उसका ऐसे इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसे कि उसका कोई हिसाब लेने वाला ही नहीं, उसका कोई महत्व ही नहीं है।
हर जगह वक़्फ़ की जायदाद की हिफ़ाज़त के लिए एक वक़्फ़ बोर्ड जैसी संस्था का संस्थागत रूप से इजाद किया गया। लेकिन वक़्फ़ की रक्षा करने वाले और उस रक्षक की निगरानी करने वाली संस्था वक़्फ़ बोर्ड ने भी इस तरह से उसका बेजा इस्तेमाल किया कि लोगों को यह कहने पर मजबूर होना पड़ कि देश और राज्यों का वक़्फ़ बोर्ड वह बिल्ली है, जिसे वक़्फ़ जैसे दूध की निगेहबानी की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई है। यह सोचना लाज़मी भी है। और सौ आने सच भी है। वक़्फ़ की जायदाद का इतना बेजा इस्तेमाल हुआ लेकिन किसी आलीम या किसी मुस्लिम धार्मिक लीडर में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह वक़्फ़ के ज़िम्मेदारान को कह सकें कि यह जागीर तुम्हारी नहीं, यह जागीर इस देश के अवाम की है। वक़्फ़ क़ौम की फ़लाह के लिए और देश के लिए किया जाता है।
हुकमरान तो हुक्मरान होता है। आज जिस आम आदमी के लिए वक़्फ़ की गई ज़मीन जायदाद को उसके निगेहबान ही हड़प गए हैं। उस जायदाद और जागीर को अपने औलादों को पालने का एक ज़रिया बना लिया है। ऐसे लोगों पर अगर सरकार नकेल डालना चाहती है, तो कौन सा बुरा कर रही है? कहां से यह अत्याचार की श्रेणी में आ गया?
सरकार के कामकाज में अड़ंगा डालना इस्लाम का हिस्सा नहीं है। और विरोध तो इस्लाम का हिस्सा ही नहीं है। इस्लाम ने सुलह और बातचीत के रास्ते को अपनाने की ताक़ीद की है। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक ने कभी भी बादशाहों की अवहेलना नहीं की। उन्होंने शासक को शासक की ही तरह समझा। उन्होंने अपने वक़्त के हुक्मरानों से विनम्रता के साथ अपनी बातें रखीं। उनसे अनुरोध किया। कोई धमकी नहीं दी। कोई तलवार नहीं तानी।
आज के तथाकथित मुस्लिम नेता और धर्मगुरु अपने पैग़म्बर के आचरण को भूल गए हैं। उनकी सुन्नतों को भूल गए हैं। वे दौलत की हवस के शिकार हो चुके हैं। और वक़्फ़ बिल का विरोध करने वाले ज़्यादातर आलीम वक़्फ़ की जायदाद और जागीर के निगेहबानों से कुछ हासिल करते रहे हैं या इसके एवज़ में उन्हें कुछ इनाम मिलने का मन में लालच है। इसलिए इस वक़्फ़ बिल पर इतना बड़ा बावेला खड़ा करने का मंसूबा बनाकर किसी भी राज्य के मुखिया और देश के बादशाह तक को निशाने पर ले रहे हैं। दरअसल जिसकी चीज़ है वक़्फ़ वह सबके सब ख़ामोश हैं। यानी देश की आम अवाम ख़ामोश है। वक़्फ़ की जायदाद और जागीर तो आम आदमी की है। आम आदमी के इस हक़ को तथाकथित धर्मगुरूओं ने वक्फ़फ के निगेहबान और सरकारी निगेहबान यानी वक़्फ़ बोर्ड के साथ मिलकर और घालमेल कर ख़ूब ग़रीबों के हक़ को पामाल किया है। उसके जज़्बात को अपने पैरों तले कुचला है। उसकी ग़रीबी के साथ धोखा किया है। जिस ग़रीबों को आगे बढ़ाने के लिए बुज़ुर्गों ने अपनी जागीर सौंपी थी, उसके सपनों को चकनाचूर किया है।
अभी भी समय है। हर ज़िला, क़स्बा, सूबे और देश की वक़्फ़ की जायदादों को आम किया जाए। इसकी जानकारी हर ग़रीबों को होनी चाहिए। उससे होने वाले इन्कम की जानकारी हर महीने मस्जिद के ज़रिए लोगों तक पहुंचनी चाहिए। और स्कूल, कॉलेज और रोज़गार सेंटर खोले जाने चाहिए, ताकि आज का मुसलमान भी देश की मुख्यधारा से जुड़ सके। देश के मुसलमानों को इस हद तक बुरे हालात पर लाने का श्रेय सरकार से ज़्यादा वक़्फ़ के निगेहबानों को जाता है। उन्हें जितना वक़्फ़ को लूटना था, उन्होंने उसका भरपूर दोहन किया है। लेकिन उन्हें या तो अपनी ज़िम्मेदारी से हट जाना चाहिए, या समाज के उत्थान के लिए वक़्फ़ की जायदाद को समाज के हित में ख़र्च करने का इंसाफ़ के साथ इरादा अब बना लेना चाहिए।
ज़ाहिर सी बात है कि जब हूक़ूमत को लगा कि वक़्फ़ संसाधनों का दुरूपयोग हो रहा है, तो सरकार ने देश हित में इस पर अंकुश लगाने का मन मनाया। मोदी सरकार ने वक़्फ़ की जायदाद के बेजा इस्तेमाल पर अंकुश लगाने का अगर इरादा बनाया है, तो मुसलमानों को बढ़-चढ़कर सरकार का साथ देना चाहिए। वक़्फ़ की संपत्ति पर सांप की तरह फन फैलाकर बैठने वाले समाज के इस ज़हरीले जानवर का फन कुचल देना चाहिए। और समाज और इस्लाम के अनुरूप मुसलमानों का हक़ ग़रीबों और मिसकिनों तक इंसाफ़ के साथ पहुंचना चाहिए। जब मुसलमान इंसाफ़ करने के लायक़ ही नहीं रह गया है, तो फिर कोई न कोई तो आगे बढ़कर इंसाफ़ करेगा। कोई भी निज़ाम मुसलमानों के ईमानदार होने की बाट कब तक जोहता रहेगा? इसलिए सरकार के इस बिल का विरोध के बजाए ठंडे दिमाग़ से सोचना होगा कि सरकार इस वक्फ़फÞ की जायदादों को किस तरह से इस्तेमला करती है। और इसका फायदा किस तरह से ग़रीबों और मिसकिनों तक कितना इंसाफ़ के साथ पहुंचता है? किसी को भी एक मौक़ा देने में हर्ज क्या है? सरकार से उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मामले में सरकार ग़रीबों के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करेगी। और वक़्फ़ की जायदादों का इस तरह से इस्तेमाल करेगी ताकि देश के मुसलमान राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़कर देश और समाज के नव-निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने के क़ाबिल बन सकें। जय हिन्द ! जय भारत !