ए आर आज़ाद की चार ग़ज़लें
1.
चराग़ करता है सफ़र अंधेरे तक
मगर ये प्यार जागता सवेरे तक
चमन भी उजड़ा उजड़ा दिख रहा है अब
ख़िज़ाँ पहुंची आज तो बसेरे तक
सदन में आए कैसे कैसे लोग अब
पहुंचे आज वादों के घनेरे तक
ग़ज़ब का ख़ात्मा ज़रूरी आज है
सहा है मैंने भी नयन तरेरे तक
जिधर भी देखो झगड़ा है लड़ाई है
बचोगे कितना आज तुम बखेरे तक
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
2.
ज़माने को बदलो धीरे धीरे
अजी अभी कहलो धीरे धीरे
दिखा दो हिम्मत अभी से तुम भी
सफ़र पे अब निकलो धीरे धीरे
है रंग लाता कभी मुक़द्दर
नसीब को चखलो धीरे धीरे
ये वक़्त भी जाएगा गुज़र ही
ग़मों को भी सहलो धीरे धीरे
बुराई अपनाना ना कभी भी
बुराई को मसलो धीरे धीरे
मुफ़ाइलातुन मुफ़ाइलातुन
3.
रंग दिल का कैसा होता है
सुर्ख़ या मटमैला होता है
मजनूं की बातें पुरानी हैं
अब कहां कोई शैदा होता है
क़िस्से हैं फ़रहाद शीरीं के
प्यार तो बस ऐसा होता है
आज मंज़र कुछ दिखे ऐसा
कुछ छबीला छैला होता है
डूब जाना रब में खो जाना
ये सिफ़त ना मैला होता है
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़े
4.
दिल के अफ़साने सुनो
मेरे मयख़ाने सुनो
दिल है पत्थर उनका तो
उनको पिघलाने सुनो
राजा क्यों ऐसा रहे
उनको समझाने सुनो
वोट दें तो अच्छों को
उनको कहलाने सुनो
फीकी फीकी ज़िंदगी
चीनी बरसाने सुनो
फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
