जिस मंच से राष्ट्रकवि काव्य-पाठ करते थे, उस मंच से हमें बोलने का अवसर मिला है : जस्टिस संजय कुमार
आज भारतीय राजनीति सबसे बड़े संक्रमण काल से गुज़र रही है : डा अनिल सुलभ
पुरस्कार हममें और अच्छा करने की प्रेरणा भरता है : ए आर आज़ाद
दिनकर जयंती पर बिहार के 14 मनीषियों को दिया गया ग्लोबल शिखर सम्मान
प्रो. तौक़ीर आलम को हज़रत मोहसिन यहिया तिरहुति रह. ग्लोबल शिखर सम्मान
हिंदी साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुआ भव्य कवि-सम्मेलन
इंस्टीट्यूट ऑफ़ एकेडमिक स्कॉलर ट्रस्ट के सौजन्य से आयोजित हुआ कार्यक्रम

23 सितंबर, 2026 को पटना के बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित दिनकर जयंती पर ग्लोबल शिखर सम्मान से बिहार के 14 मनीषी नवाज़े गए। यह सम्मान समारोह राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका ग्लोबल ऑब्ज़र्वर की ओर से आयोजित किया गया था। समारोह के उद्घाटनकर्ता एवं मुख्य अतिथि राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार थे। उन्होंने अपना उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि यह हम सबका सौभाग्य है कि जिस मंच से राष्ट्रकवि काव्य-पाठ करते थे, उस मंच से हमें बोलने का अवसर मिला है। दिनकर अपने ओज के काव्य और मूल्यवान गद्य के लिए अमर रहेंगे।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था, राजनीति जब-जब लड़खड़ाती है, साहित्य उसे संभाल लेता है। ये बात राष्ट्रकवि ने तब कही थी, जब प्रधानमंत्री नेहरू सीढ़ी से उतरते हुए फिसल गए थे, और दिनकर ने फौरन उन्हें थाम लिया था। उन्होंने आगे कहा कि वर्ष 1956 में सम्मेलन का रजत-जयंती समारोह दिनकर जी की अध्यक्षता में आयोजित हुआ था। इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद ने किया था। और स्वागताध्यक्ष बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू श्रीकृष्ण सिंह थे। डा. सुलभ ने कहा कि आज भारतीय राजनीति अबतक के सबसे बड़े संक्रमण काल से गुज़र रही है। इसे अब साहित्य ही संभाल सकता है। लेकिन हमें यह सोचना होगा कि क्या अभी का साहित्य संभालने की स्थिति के लिए ख़ुद को तैयार किया है?

इस अवसर पर, इंस्टीट्यूट ऑफ एकेडेमिक स्कॉलर ट्रस्ट के चेयरमैन, ग्लोबल ऑब्जर्वर के संपादक एवं 33 पुस्तकों के लेखक ए आर आज़ाद ने कहा कि देश के साहित्यकारों को दिनकर से प्रेरणा लेकर अपने शब्दों में ओजस्विता, न्याय और लोकहित की भावना भरने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पुरस्कार हममें और अच्छा करने की प्रेरणा भरता है। बिहार की शिक्षा को बुलंदी प्रदान करने में कॉलेज के प्राचार्यों की अहम भूमिका होती। हमें उम्मीद है कि यहां उपस्थित प्राचार्य एवं प्राध्यापक इस अहम भूमिका का निर्वाह और अधिक तेज़ी और ईमानदारी से करेंगे। इसलिए कि बिहार को अपने पुराने मुक़ाम को हासिल करना है।

उन्होंने पत्रकारिता पर अपने विचार व्यक करते हुए कहा कि देश की पत्रकारिता आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वैसे में आज देश को कई ग्लोबल ऑब्ज़र्वर और दूसरा मत की ज़रूरत है। ऐसा इसलिए कि आज पत्रकारिता जगत ने अपनी गरिमा को भूला दिया है। पत्रकारिता का मक़सद बदल गया है। उसका रास्ता बदल गया है। और पत्रकारिता आज अपने उद्देश्य से भटक गई है। दरअसल पत्रकारिता का मक़सद समाज के लिए विनाशकारी और विघटन कारी नीतियों का विरोध करते हुए लोककल्याऩ की नीतियों के मार्ग को प्रशस्त कराना और उसी दिशा में आगे बढ़ना है। पत्रकारिता का काम विशुद्ध विपक्ष का निर्वाह करना है। पत्रकारिता का काम सियासत, सरकार और प्रशासन को आईना दिखाना है। उन्हें लोककल्याणकारी बनाना है। सरकार और सियासत की चापलूसी करना क़तई पत्रकारिता नहीं है।

इस अवसर पर बिहार के 14 विदुषियों और विद्वानों को विभिन्न महापुरुषों के नाम पर ग्लोबल शिखर सम्मान प्रदान करने का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ग्लोबल ऑब्जर्वर की ओर से देश की महान विभूतियों के नाम पर बिहार के चंद शिक्षाविदों को यह सम्मान दिया जा रहा है। इसी सम्मान में मौलाना मज़हरूल हक़ अरबी-फारसी यूनिवर्सिटी के एक्स प्रो वी.सी. जनाब प्रो (डॉ) तौक़ीर आलम को दिया जाने वाला सम्मान हज़रत मोहसिन यहिया तिरहूति रह. ग्लोबल शिखर सम्मान की बात करते हैं।

हज़रत मोहसिन यहिया तिरहूति रह. 1857 के गुमनाम लीडर हैं। 1857 से पहले तक वे हरम शरीफ़ यानी मक्का में शिक्षण कार्य को अंजाम देते थे। कहा जाता है कि उनकी अथाह ज्ञान के कारण ही उन्हें पढ़ाने की अनुमति दी गई। और इसके लिए मक्का के शासकों को अपने नियमों में बदलाव करना पड़ा। नियम यही था कि मक्का और हरम शरीफ़ में ग़ैर अरबी मुल्की को अध्यापन की इजाज़त नहीं थी। उन्होंने हरम शरीफ़ में लगभग आठ साल तक अध्यापन किया। और फिर जब देश अंग्रेज़ों के अत्याचरा से छटपटा रहा था, तो देश के शीर्ष उलेमाओं ने मेरठ में नेतृत्व करने के लिए हज़रत मोहसिन यहिया तिरहूति रह. को बुलावा भेजा। उन्होंने देशप्रेम को फ़ौक़ियत दी। और स्वदेश लौट आएं। यानी वे सीधे मेरठ पहुंचे। और उलेमाओं का नेतृत्व किया। फिर ख़िज़रचक में एशिया की सबसे बड़ी लाइब्ररी की स्थापना की। 108 बड़े कमरों में उन्होंने लाइब्रेरी खोली। और उस लाइब्रेरी में सिर्फ एशियाई देश के लोग ही नहीं बल्कि उस ज़माने के मिश्र, सऊदी और जितने भी मुस्लिम कंट्री हैं, उनके स्कॉलर इस लाइब्रेरी का फायदा उठाने के लिए आया करते हैं।
इन्हें दुनिया का 750वां आलीम के तौर पर किताबों में दर्ज किया गया है। और बिहारी लाल फितरत ने अपनी पुस्तक में इनका बाइज्ज़त उल्लेख किया है। हज़रत मोहसिन यहिया तिरहूति रह. ने हरम शरीफ़ में बैठकर जो आठ किताबें लिखीं में अलजायिनी शीर्षक से एक पुस्तक है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस पुस्तक को जिसने नहीं पढ़ी, वह हदीस को जानने का सही-सही दावा नहीं कर सकता है। इतनी बड़ी महान हस्ती बेगूसराय के ही हैं। और हमारे अपने हैं। इस अवार्ड को पाने के लिए मैं प्रो. डाक्टर तौक़ीर आलम को बहुत-बहुत मुबारकबाद पेश करता हूं। और देश की महान विभूतियों के नाम पर अवार्ड पाने वाले सभी अवार्डियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए, उन्हें मुबारकबाद पेश करता हूं।

उन्होंने अपने संबोधन को विराम देने से पहले कहा कि आज हमारे प्रिय कवि दिनकर की जयंती है। वे भी हमारी ही धरती के हैं। या कहिए कि मैं भी उन्हीं की धरती का हूं। उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन करते हुए एक ग़ज़ल से उन्हें अपनी श्रद्धांजिल अर्पित करता हूं-
हां उर्वशी रश्मि रथी हुंकार बने दिनकर
निज मौलिकता के पारावार बने दिनकर
लथपथ सबने देखे हैं हाथ तो मिट्टी से
गढ़ने साहित्य मूर्तिकार बने दिनकर
रश्मि रथी में तो उभारी ऐसी तस्वीरें
आईना दिखा सकें वो भी कुम्हार बने दिनकर
बनकर परवत छू लिया था विशाल नगपति नभ
साहित्य की दुनिया का उदगार बने दिनकर
दिनकर व कुमुद सी हाशमी की भी निदा गूँजी
सदा एक दूजे के पैरोकार बने दिनकर

समारोह को संबोधित करते हुए मौलाना मजहरूल हक़ अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति प्रो तौकीर आलम ने कहा कि मुझे हज़रत मोहसिन यहिया तिरहुति रह. ग्लोबल शिखर सम्मान दिया गया है। इतना बड़ा नाम और मुझ जैसे छोटे को इतना बड़ा सम्मान देना मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं हज़रत मोहसिन यहिया तिरहुति रह. के पैर की धूल भी नहीं हूं। वे देश की बड़ी शख़्सियत थे। ए आर आज़ाद साहब का मैं शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने मुझे जैसी नाचीज़ को इतना बड़ी महान हस्ती और शिक्षाविद् के नाम पर इतना बड़ा सम्मान दिया है।

कार्यक्रम के दौरान मौजूद पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो अबु बकर ने अपने संबोधन में दिनकर के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा का ज़िक्र किया। उन्होंने अवार्ड को हासिल किए जाने पर गौरव का अनुभव करते हुए ग्लोबल ऑब्ज़र्वर एवं इंस्टीट्यूट ऑफ़ एकेडमिक स्कॉलर ट्रस्ट को धन्यवाद दिया। और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर दिनकर के बहाने अपने उद्गार व्यक्ति किए।

इस मौक़े पर बिहार के जिन 14 शिक्षाविद्, मनीषी एवं विदुषियों को ग्लोबल शिखर सम्मान दिया गया, उनमें मौलाना मजहरूल हक अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति प्रो तौकीर आलम को हज़रत मोहसिन यहिया तिरहूति ग्लोबल शिखर सम्मान, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो अबु बकर को डॉ. हुमायूँ कबीर ग्लोबल शिखर सम्मान, एस एम डी कॅलेज, पुनपुन के प्राचार्य प्रो मधुरेंद्र को महर्षि अरविन्द ग्लोबल शिखर सम्मान, एम.एम. कालेज विक्रम की प्राचार्य प्रो विजय लक्ष्मी को साबित्री बाई फुले ग्लोबल शिखर सम्मान, नालंदा कॉलेज, बिहार शरीफ़ की प्राचार्य प्रो सुनीता सिन्हा को दुर्गाबाई देशमुख ग्लोबल शिखर सम्मान, रामकृष्ण द्वारिका कॉलेज, पटना की प्राचार्य प्रो सीता सिन्हा को अबुल कलाम आज़ाद ग्लोबल शिखर सम्मान, महिला कॉलेज खगौल की प्राचार्य प्रो उषा विद्यार्थी को श्री निवास रामानुजन ग्लोबल शिखर सम्मान, महाराजा कॉलेज आरा की प्राचार्य प्रो कनक लता कुमारी को डॉ ज़ाकिर हुसैन ग्लोबल शिखर सम्मान, महिला कॉलेज, खगौल की बर्सर डा ख़ुशबू फ़ातिमा को मौलाना मुहम्मद अली जौहर ग्लोबल शिखर सम्मान, वर्धमान महावीर महाविद्यालय, पावापुरी के प्राचार्य प्रो शैलेंद्र कुमार सिंह को मदन मोहन मालवीय ग्लोबल शिखर सम्मान, डिग्री कॉलेज, दनियावां के प्राचार्य प्रो ख़ालिद अहमद को ईश्वरचंद्र विद्यासागर ग्लोबल शिखर सम्मान, जी. जे. कालेज, बिहटा के बर्सर एवं साहित्यकार डा मुकेश कुमार को सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ ग्लोबल शिखर सम्मान, के वी साइंस कॉलेज, बेनीपट्टी के प्राचार्य प्रो गजेंद्र प्रसाद गड़कर को डॉ. बी.आर. अंबेडकर ग्लोबल शिखर सम्मान एवं गुरु गोविंद सिंह कालेज, पटनासिटी के बर्सर प्रो फ़ज़ल अहमद को डॉ. विक्रम ए. साराभाई ग्लोबल शिखर सम्मान से विभूषित किया गया।

इस मौक़े पर एपीजे अब्दुल कलाम सीनियर सेकेंड्री स्कूल, जमशेदपुर के निदेशक ताहिर हुसैन को को शॉल और पुस्तक देकर सम्मानित किया गया।
सम्मान से पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि दिनकर सत्य में ही अपने समय के सूर्य और साहित्य के गौरव-पुरुष थे। आग और राग के कवि दिनकर के गद्य भी काव्यमय है। संस्कृति के चार अध्याय में उनकी प्रतिभा की अनुभूति की जा सकती है।

कवि-गोष्ठी का आरंभ सुकंठी कवयित्री आराधना प्रसाद ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, डा रत्नेश्वर सिंह, कृष्ण मोहन मिश्र, डा पुष्पा जमुआर, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, तनुजा सिन्हा, ईं अशोक कुमार, पं गणेश झा, सिद्धेश्वर, ईं आनन्द किशोर मिश्र, सदानन्द प्रसाद, डा नागेन्द्र शर्मा, इन्दु भूषण सहाय, अरुण कुमार श्रीवास्तव, श्रीकांत व्यास, सुनीता रंजन, इन्दु भूषण सहाय, शंकर शरण मधुकर, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, अभिराम बुद्धवाहा, सूरजदेव सिंह, डा प्रशांत कुमार, अर्चना भारती, बिंदेश्वर प्रसाद गुप्त, राम गणित कुमार, ऋषभ राज, नन्दन कुमार, साकेत राज सिंह आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपने काव्य-पाठ से राष्ट्रकवि को श्रद्धांजलि अर्पित की।

मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने और धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

इस मौक़े पर प्रवीर कुमार पंकज, वीरेंद्र यादव, अमृतनिधि समेत बड़ी संख्या में सुधीजन उपस्थित थे।

पटना के सामाजिक कार्यकर्ता शौक़त अली रिज़वी ने मंच के सम्माननीय अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने सभी गणमान्य को शॉल भेंट की। और उनका खैर
मक़दम किया।
ब्यूरो रिपोर्ट दूसरा मत
