साहित्य सम्मेलन के 44वें महाधिवेशन में बोले बिहार के राज्यपाल- पूरे देश से संवाद के लिए हिन्दी आवश्यक
गवर्नर आरिफ़ मोहम्मद खान को दिया गया सम्मेलन की उच्च उपाधि ‘विद्या वारिधि’
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार ए आर आज़ाद की दो पुस्तकों का लोकार्पण
‘सम्मेलन साहित्य’ के महाधिवेशन विशेषांक का लोकार्पण

20 दिसम्बर को पटना में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 44वां महाधिवेशन मनाया गया। सिख पंथ के नवम गुरु और बलिदानी संत, गुरु तेग बहादुर के बलिदान के 350 वें वर्ष को समर्पित, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय 44 वें महाधिवेशन का उद्घाटन करते हुए बिहार के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान ने कहा कि देश में सभी भारतीय भाषाओं की ऊन्नति हो यह आवश्यक है, लेकिन एक स्वतंत्र राष्ट्र के लिए आवश्यक है कि देश की एक भाषा को इस तरह विकसित किया जाए, जिसमें पूरा देश संवाद कर सके। और हमें किसी विदेशी भाषा पर निर्भर न रहना पड़े।

राज्यपाल ने कहा कि भाषा के प्रति भारत का दृष्टिकोण आदि काल से समावेशी और श्रद्धापूर्ण रहा है। हमारे ऋषिगण यह कहते आएं हैं कि ज्ञान की समृद्धि के लिए अधिक से अधिक भाषाओं का ज्ञान लाभकारी है। ज्ञान के विस्तार के लिए और ज्ञानार्जन के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाएं जाननी चाहिए। ‘भाषा’ तो साक्षात सरस्वती है। इसके विना संवाद और ज्ञान का विकास संभव ही नहीं है। ज्ञान से विवेक, संवेदना और करुणा की प्राप्ति होती है। डा राधा कृष्णन कहा करते थे कि यदि हम मूल्यवान और सम्मान जनक जीवन चाहते हैं, तो अपने भीतर संवेदना और करुणा को विशेष स्थान देना होगा। करुणा से प्रेरित जो कर्म है, वही आनन्ददायी है।

उन्होंने आगे कहा कि गुरु तेग बहादुर महान बलिदानी संत थे। उनका बलिदान आत्म-रक्षा के अधिकार के सरक्षण के लिए दुनिया के समक्ष रखा गया एक आदर्श है। अस्मिता, विचारों की स्वतंत्रता और मानवाधिकार की रक्षा भी आत्म-रक्षा के सिद्धांत के अंतर्गत ही है। दुनिया में हर देश का क़ानून’आत्म-रक्षा के सिद्धांत’ की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। भारतवर्ष गुरु तेग बहादुर के प्रति उनके महान बलिदान के लिए सदा कृतज्ञ रहेगा।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि हिन्दी देश की आत्मा है। भारत की सुंदरतम अभिव्यक्ति इसी भाषा में हो सकती है। यह सभी भारतीय भाषाओं से प्रेम करती है। सबका सम्मान करती है। यह केवल पूरे देश को ही नहीं, देश की समस्त भाषाओं को भी एक दूसरे से जोड़ेगी। देश के लोग चाहते हैं कि यह देश की राष्ट्रभाषा बने। शासन को चाहिए कि जनाकांक्षा पूरी करे।
डा सुलभ ने राज्यपाल को सम्मेलन की उच्च मानद उपाधि ‘विद्या वारिधि’ से विभूषित किया।

इस मौके पर राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान ने वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार एवं दूसरा मत के संपादक ए आर आज़ाद की दो पुस्तकें ‘नदी’ और रुएज़मीं’ की का विमोचन किया। रूएज़मीं हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह है, जबकि नदी कविता-संग्रह है। इस मौक़े पर सम्मेलन की पत्रिका ‘सम्मेलन साहित्य’ के महाधिवेशन विशेषांक का भी लोकार्पण हुआ।
राज्यपाल ने मौरिशस की सुविख्यात विदुषी डा सरिता बुधु और केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डा सुनील बाबूराव कुलकर्णी समेत देश के 21 हिन्दी-सेवियों को विविध अलंकरणों से सम्मानित किया।
समारोह में अपने विचार रखते हुए सिक्किम के पूर्व राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कहा कि हिन्दी पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। हम सभी को मिलकर इसे और अधिक शक्ति देनी चाहिए।

आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए, महाधिवेशन के स्वागताध्यक्ष, विधायक और सुप्रसिद्ध नेत्र-रोग विशेषज्ञ डा राज वर्धन आज़ाद ने कहा कि वर्तमान अध्यक्ष के कार्यकाल में इसके गौरव में वृद्धि हो रही है।
धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने तथा मंच-संचालन सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने किया। इस सत्र के संयोजक थे कुमार अनुपम ।
प्रथम वैचारिक सत्र
उद्घाटन-समारोह के बाद सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा उपेन्द्रनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता में, महाधिवेशन का प्रथम वैचारिक सत्र आरंभ हुआ, जिसका विषय ‘गुरु तेग बहादुर का सांस्कृतिक और साहित्यिक अवदान” रखा गया था। मुख्य वक्ता ज्ञानी दलजीत सिंह ने कहा कि गुरु महाराज ने भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सिर दे दिया, पर सिर झुकने नहीं दिया। उनका बलिदान बेमिसाल है।
ग्रंथी सरदार दिलीप सिंह, रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डा जंग बहादुर पाण्डेय, पद्मश्री विमल जैन तथा आनन्द मोहन झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन की कला मंत्री डा पल्लवी विश्वास ने तथा सत्र का संचालन डा ध्रुव कुमार ने किया। इस सत्र की संयोजक थी कवयित्री लता प्रासर।
दूसरा वैचारिक सत्र
भोजनावकाश के पश्चात दूसरा सत्र आरंभ हुआ, जिसका विषय था ‘हिन्दी कथा साहित्य में बिहार का योगदान’। सत्र का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डा सुनील बाबूराव कुलकर्णी ने बिहार के कथाकारों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया और बिहार के योगदान की प्रशंसा की।
सत्राध्यक्ष डा उपेंद्रनाथ पाण्डेय ने कहा कि कथा-साहित्य में बिहार का योगदान इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि देश के किसी भी साहित्यकार ने वह कार्य नहीं किया, जो बिहार ने किया। कथा और कहानी उसी की पढ़ी जाएगी, जिसमें कथा-वस्तु उस स्तर की हो। किताबों की संख्या बढ़ा देने से कोई बड़ा कथाकार नहीं हो सकता।
इस सत्र में सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा मधु वर्मा, भगवती प्रसाद द्विवेदी, किरण सिंह तथा डा भावना शेखर ने अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन सागरिका राय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन डा पुष्पा जमुआर ने किया। सत्र के संयोजक थे डा मनोज गोवर्धनपुरी ।
तीसरा वैचारिक-सत्र
आकाशवाणी, पटना के पूर्व सहायक निदेशक और साहित्यकार डा किशोर सिन्हा की अध्यक्षता में तीसरा वैचारिक सत्र आयोजित हुआ जिसका विषय था ‘हिन्दी में विज्ञान साहित्य’। सुप्रसिद्ध विज्ञान-कथा लेखक डा रमेश पाठक ने विषय प्रवेश किया।
मुख्य वक्ता और पटना विश्व विद्यालय में भौतक-शास्त्र के पूर्व प्राध्यापक डा नरेंद्रनाथ पाण्डेय, डा मेहता नगेंद्र सिंह, डा उपेन्द्रनाथ पाण्डेय, ईं अशोक कुमार ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन सम्मेलन की संगठन मंत्री डा शालिनी पाण्डेय ने किया। इस सत्र की संयोजक थी स्वागत समिति की महासचिव डा रेखा भारती।
चतुर्थ वैचारिक सत्र
गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो राम दरश राय की अध्यक्षता में महाधिवेशन का चौथा वैचारिक-सत्र आयोजित हुआ, जिसका विषय था “आधुनिकता और नयी कविता”। कविता के बदलते तेवर पर इस सत्र में गम्भीर चिंतन हुआ।
वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, डा सुमेधा पाठक, आचार्य विजय गुंजन तथा डा पूनम आनन्द ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन लता प्रासर ने किया। संयोजक थीं डा नीतू सिंह ।
सांस्कृतिक कार्यक्रम
चारों वैचारिक सत्रों के बाद अतिथियों एवं प्रतिनिधियों के सम्मान में एक भव्य सांस्कृतिक-कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया। सबसे पहले गुरु तेग बहादुर के जीवन पर गीत-नाटिका ‘हिन्द की चादर’ की प्रस्तुति हुई, जिसका निर्देशन आयुर्मान यास्क ने किया। इसके पश्चात हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय गजलकार दुष्यंत की ग़ज़लों का गायन डा शंकर प्रसाद ने किया, जिसका शीर्षक था ‘जिसे मैं ओढ़ता बिछाता हूँ’। तीसरी प्रस्तुति महाकवि काशीनाथ पाण्डेय विरचित नृत्य-नाटिका ‘कृष्ण-राधायण’ की हुई, जिसका निर्देशन डा पल्लवी विश्वास ने तथा संगीत-निर्देशन पं अविनय काशीनाथ ने किया। अंतिम प्रस्तुति मुंबई की सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डा अनु के मनोहारी कत्थक नृत्य के रूप में हुई। इन प्रस्तुतियों ने सभी प्रतिनिधियों के मन का पर्याप्त रंजन किया, जिसका प्रमाण निरन्तर हो रही तालियों की गड़गड़ाहट थी।
सम्मानित होने वाले विद्वानों और विदुषियों में डा दिनेश शर्मा (अलीगढ़), डा अवधेश कुमार (वर्धा), डा देवेन्द्र देव मिर्जापुरी, डा लता चौहान (बेंगलुरू), रचना सरन ( कोलकाता), डा मनोज कुमार झा (पटना), बेबी कारफ़रमा ( कोलकाता), डा अजय कुमार ओझा (दिल्ली), डा शिवानन्द शुक्ल ( राय बरेली), रंजीता सिंह (देहरादून), ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री (फर्रुखाबाद), डा आरती सिंह ( गोरखपुर), सुलेखा झा (अररिया), ईश्वरचन्द्र विद्यावाचस्पति ( संत कबीर नगर), डा राम दरश राय (गोरखपुर), डा वीणा मेदिनी (बेंगलुरु), अनामिका चक्रवर्ती, विनय पंवार (गुरुग्राम) तथा डा राम कुमार झा “निकुंज” के नाम सम्मिलित हैं।
कार्यक्रम के दूसरे दिन साहित्यकारों ने एक स्वर में कहा कि हिन्दी देश की किसी भी दूसरी भाषा का नहीं, केवल अंग्रेज़ी का स्थान चाहती है। इस मौक़े पर पचास साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। और कवि सम्मेलन का भी आयोजन हुआ।
इस मौक़े पर समापन-सह-सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि और राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग, बिहार के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा बने इस हेतु बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रयास अत्यंत सराहनीय है।
स्वागताध्यक्ष डा राजवर्धन आज़ाद ने सभी प्रतिनिधियों और अतिथियों के प्रति आभार प्रकट किया और कहा कि देश भर से सैकड़ों की संख्या में आए विद्वानों से यह महाधिवेशन गौरवान्वित हुआ और हिन्दी का एक बड़ा संदेश लेकर लोग अपने प्रदेश लौट रहे हैं।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कार्यसमिति और स्वागत समिति के सभी अधिकारियों और सदस्यों के प्रति आभार प्रकट किया, जिनके अथक और अनवरत श्रम से यह महाधिवेशन भव्य रूप में संपन्न हुआ। उन्होंने सभी प्रतिभागी साहित्यकारों से महाधिवेशन में लिए गए संकल्पों की पूर्ति हेतु, नई ऊर्जा के साथ सन्नद्ध होने का आह्वान किया।
बिहार के विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डा सुनील बाबूराव कुलकर्णी, वरिष्ठ गीतकार पं बुद्धि नाथ मिश्र, सुविख्यात पत्रकार आशुतोष, भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद, राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष अप्सरा, प्रो सविता झा तथा सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन डा शंकर प्रसाद ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन भगवती प्रसाद द्विवेदी ने किया।
पंचम वैचारिक सत्र
समापन समारोह के पूर्व महाधिवेशन के तीन वैचारिक-सत्र और कवि-सम्मेलन भी संपन्न हुआ। प्रथम और महाधिवेशन का पंचम वैचारिक सत्र का विषय था- “भारत के हिन्दीतर साहित्य के संवर्धन में हिन्दी”। सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डा सुनील बाबूराव कुलकर्णी ने किया।
मुख्य वक्ता और महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के मानविकी संक़ाय के अध्यक्ष प्रो अवधेश कुमार,बेंगलुरु की वरिष्ठ कवयित्री डा लता चौहान तथा डा सीमा यादव ने भी अपने पत्र प्रस्तुत किए। मंच का संचालन डा अर्चना त्रिपाठी ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया। सत्र की संयोजक थीं डा सुषमा कुमारी।
छठा वैचारिक सत्र
आज के दूसरे और महाधिवेशन के छठे वैचारिक सत्र का विषय था “राष्ट्रभाषा-आंदोलन की विधिक-व्यवस्था” । इस सत्र का उद्घाटन करते हुए पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डा अंशुमान ने कहा कि न्याय की भाषा जबतक प्रार्थी की भाषा नहीं होगी, उचित न्याय नहीं हो सकेगा। पटना उच्च न्यायालय ही क्या देश के सभी न्यायालयों में अधिवक्ताओं द्वारा हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा में याचिकाएँ करनी चाहिए।
डा अवधेश कुमार की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में अधिवक्ता इन्द्रदेव प्रसाद तथा डा जयंत कर शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के वरीय उपाध्यक्ष जियालाल आर्य ने किया।
सातवाँ वैचारिक सत्र
आज के अंतिम और सातवें सत्र, जिसका विषय “‘काव्य-साहित्य में बिहार का योगदान” था, का उद्घाटन महाधिवेशन के स्वागताध्यक्ष और विधायक डा राजवर्द्धन आज़ाद ने किया। इस सत्र में बिहार् के यशस्वी राजनेता और महाकवि भागवत झा आज़ाद पर केंद्रीय वक्तव्य सुप्रसिद्ध पत्रकार आशुतोष ने दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति मनुष्य को क्रूर, स्वार्थी और भ्रष्ट बनाती है। किंतु महाकवि आज़ाद ने अपने आचरण और लेखनी से यह सिद्ध किया कि यदि मनुष्य अपने जीवन को मानव-कल्याण के निमित्त अर्पित करता है, तो उसे राजनीति की कालिमा नहीं लग सकती। महाकवि विरचित महाकाव्य ‘मृत्यंजयी’ में, जो महात्मा बुद्ध पर केंद्रित है कवि ने अपने व्यापक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त किया है। यह पुस्तक अद्भुत है।
भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और महाकवि के पुत्र यशोवर्धन आज़ाद की अध्यक्षता में आहूत इस सत्र में डा शंकर प्रसाद तथा डा सविता झा ने भी अपने पत्र प्रस्तुत किए।
कवि सम्मेलन
वैचारिक सत्रों की समाप्ति के पश्चात, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कवि पं बुद्धिनाथ मिश्र की अध्यक्षता में विराट कवि सम्मेलन आहूत हुआ, जिसका उद्घाटन बिहार के विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह ने किया। कवि-सम्मेलन में देश के विभिन्न प्रांतों से आए दर्जनों कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से सम्मेलन को रस-सिकत किया। निम्नलिखित विदुषियों और विद्वानों को सम्मानित किया गया –

डा आरती सिंह : गोरखपुर : महीयसी डा मृदुला सिंहा स्मृति सम्मान
श्री अनुज बेचैन : औरंगाबाद : कविवर गोपाल सिंह ‘नेपाली’सम्मान
डा रेणु मिश्रा : आरा : शांता सिन्हा स्मृति-सम्मान
डा रामदरश राय : गोरखपुर : पं रामदयाल पाण्डेय स्मृति सम्मान
श्रीमती गीता चौबे : बेंगलुरु : अंबालिका देवी सम्मान
डा अलका वर्मा : अररिया : डा उषा रानी ‘दीन’ स्मृति सम्मान
प्रो सुनीता सृष्टि : मुज़फ़्फ़रपुर : डा शांति जैन स्मृति सम्मान
डा दीपक कुमार : जहानाबाद : प्रो केसरी कुमार स्मृति सम्मान
डा अताउल्लाह खान आलवी : सासाराम : राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह सम्मान
मृत्यंजय मिश्र ‘करुणेश’ : देवरिया : डा श्यामनंदन किशोर स्मृति सम्मान
डा ममता मिश्र : आरा : डा शांति सुमन
डा बीरेन्द्र कुमार मल्लिक : मधुबनी : ब्रजनंदन सहाय ‘ब्रजवल्लभ’ सम्मान
डा लोकनाथ मिश्र : पूसा : पोद्दार रामावतार ‘अरुण’ सम्मान
डा रंजीता तिवारी : पटना : विदुषी बिन्दु सिन्हा स्मृति सम्मान
डा आशा तिवारी ओझा : भागलपुर : विदुषी गिरिजा वर्णवाल सम्मान
डा रेणु शर्मा ‘राध्या’ : वैशाली : प्रकाशवती नारायण सम्मान
डा अजय कुमार मीत : कटिहार : डा मुरलीधर श्रीवास्तव ‘शेखर’सम्मान
डा संध्या रानी : चतरा : कुमारी राधा स्मृति सम्मान
श्री विनोद कुमार ‘नैतिक’ : कटिहार : पं राम दयाल पांडेय सम्मान
डा नवीन निकुंज : भागलपुर : डा परमानन्द पाण्डेय सम्मान
श्रीमती निर्मला कर्ण : राँची : रमणिका गुप्ता स्मृति सम्मान म्मान
श्री मुकुंद प्रकाश मिश्र : शिवहर : आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव स्मृति सम्मान
डा नागेंद्र कुमार शर्मा : पटना : बाबा नागार्जुन सम्मान
श्री उमेश मिश्र : पटना : प्रो मुरलीधर श्रीवास्तव ‘शेखर’ सम्मान
श्री देवेन्द्र सिंह आज़ाद : लखीसराय : डा रामप्रसाद सिंह लोक-साहित्यसम्मान
डा अजय कुमार : पटना : साहित्य सारथी बलभद्र कल्याण सम्मान
श्री रजनीश कुमार गौरव : सारण : पं प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’ सम्मान न
श्री अरविन्द कुमार भारती : लखीसराय : पं हंस कुमार तिवारी स्मृति सम्मान
डा शुभ कुमार वर्णवाल : बेनीपट्टी : डा कुमार विमल सम्मान
श्री आशीष सागर : बाँका : रघुवीर नारायण सम्मान
श्री राजेश कुमार यादव : मोहनियाँ : प्रो सीताराम सिंह ‘दीन’ स्मृति सम्मान
श्री अमित कुमार राय : बाँका : डा शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव स्मृति सम्मान
डा अजेय कुमार : विक्रम : प्रो मथुरा प्रसाद दीक्षित स्मृति सम्मान
डा मन्नू राय : सिवान : प्रो अमरनाथ सिन्हा स्मृति सम्मान
श्री संजय कुमार यादव : सिवान : साहित्यसारथी बलभद्र कल्याण सम्मान
डा कुमार विमलेन्दु सिंह : पटना : प्रो केसरी कुमार स्मृति सम्मान
श्री महेश्वर ओझा ‘महेश’ : बक्सर : पं जगन्नाथ प्रसाद मिश्र गौड़ ‘कमल’ सम्मान
श्री रक्षित राज : शिवहर : डा नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ स्मृति सम्मान
‘मीनू’ मीना सिन्हा : राँची : डा सुलक्ष्मी कुमारी स्मृति-सम्मान
श्रीमती संगीता मिश्र : छपरा : विदुषी अनुपमानाथ स्मृति सम्मान
मोहम्मद मुमताज़ हसन : गया : पीर मुहम्मद मूनिस सम्मान
श्रीमती ज्योति मिश्र : भागलपुर : विदुषी शैलजा जयमाला स्मृति-सम्मान
डा सुमन लता : औरंगाबाद : किशोरी चतुर्वेदी स्मृति सम्मान
श्रीमती कंचन अपराजिता : टोकियो : डा वीणा कर्ण स्मृति सम्मान
डा विदुषी आमेटा : राजस्थान : विदुषी कुमुद शुक्ल स्मृति-सम्मान
आचार्य अनिमेष : पटना : डा चतुर्भुज स्मृति सम्मान
डा दीपाली कुमारी : वैशाली : निरोज सिन्हा स्मृति सम्मान
डा अनुपम शर्मा : सुल्तानपुर : राष्ट्रभाषा प्रहरी नृपेंद्रनाथ गुप्त सम्मान
सुश्री प्रियंका कुमारी : पटना : विनोदिनी शर्मा स्मृति-सम्मान
डा संजय कुमार सिन्हा : बिहार शरीफ़ : आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव स्मृति सम्मान
ब्यूरो रिपोर्ट दूसरा मत
