जश्न ए आज़ादी की मुबारकबाद ए आर आज़ाद की इस ग़ज़ल के साथ
ग़ज़ल
ए आर आज़ाद
जश्न मनाएं ये भी गर्दन झुका कर
तोड़ा गया आपको क़स्दन झुका कर
गोरों ने लूटा था तो ऐसे ही वतन
पूछना मत क्या मिला राजन झुका कर
अच्छी की उम्मीदों ने मारा है हमें
कहती रसोई ये तो बर्तन झुका कर
बाँट दिए उसने हमें आपको तो
बाँट लिया आपने आँगन झुका कर
उनको तो आईना दिखाना था ज़रा
करने लगे हम ही तो लेखन झुका कर
ऋषियों की धरती है फ़क़ीरों की ज़मीं
ख़ौफ़ में करना नहीं चिंतन झुका कर
देख लिया दोस्त तुझे मैं ने अभी
देखो दिखाता हूं मैं शासन झुका कर
पेट की ख़ातिर हो रहा है यहां सब
बाँट रहे आज वो राशन झुका कर
अब उठो सोचो ज़रा समझो भी ज़रा
जीना भी क्या जीना है जीवन झुका कर
हौसला रखना सदा उम्मीद से तुम
खाना नहीं नज़रों से भोजन झुका कर
रस्म चलन मायने रखते हैं बहुत
नज़रों को रखना ज़रा दुल्हन झुका कर
अपना बनाना हो अगर आज उसे
रखना अभी से ज़रा बंधन झुका कर
देवता तो देवता होता है सुनो
श्रद्धा कहे ना करो पूजन झुका कर
वोट के धंधे में ज़मीरें झुकी हैं
आत्मा को ऐसे है निर्धन झुका कर
सीना को ताने खड़ा है हक़ के लिए
आसां नहीं देख ले यौवन झुका कर
देखो मुझे तुम उसी अंदाज़ से फिर
हूं खड़ी गर्दन मैं तो साजन झुका कर
बारिशें छुप छुप रहीं है आज ज़रा
धूप ये दम लेगी क्या सावन झुका कर
लफ़्ज़ों की है अपनी ग़ज़ब दुनिया सुनो
करना नहीं आज से सृ-जन झुका कर
जीत की उम्मीद किया करना सदा
मान भी लेना उसे फौरन झुका कर
फैला के दामन क्या मिलेगा कहो तुम
मिलता नहीं कुछ भी तो दामन झुका कर
जुमलों ने भारत को बहुत धोखा दिया
लेना है दम आज तो स्लोगन झुका कर
मुफ़तइलुन मुफ़तइलुन मुफ़तइलुन

