दूसरा मत के संपादक और 33 मौलिक पुस्तकों के लेखक ए आर आज़ाद पहुंचे सैयद मोहसिन यहिया तिरहुति रह. की सरज़मीं ख़िज़िरचक
सैयद मोहसिन यहिया तिरहुति रह.अलैहि की सरज़मी ख़िज़रचक जाने का 4 सितंबर, 2026 को सर्फ़ हासिल हुआ। उन्होंने अपनी हयात में वहां 106 कमरों में उस वक़्त की एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी क़ायम की थी। मान्यता और प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ इस लाइब्रेरी में चीन, मिश्र, मक्का और कई मुस्लिम देशों के स्टूडेंट्स और स्कॉलर अध्ययन करने आया करते थे।

मौलाना सैयद मोहसिन यहिया अरबी के बहुत बड़े ज्ञाता थे। उनके इस ज्ञान की वजह से उस समय के बादशाह ने अपने नियमों को बदलकर इन्हें मक्का शरीफ़ में पढ़ाने की इजाज़त दी। नतीजे में वहां शिक्षा प्रदान कराते हुए कई पुस्तकें भी लिखीं। इन्हीं कई पुस्तकों में उनकी एक चर्चित पुस्तक आई जो, इस दौर तक में मशहूर है। कहा जाता है कि जिसने इस पुस्तक को नहीं पढ़ा, वो हदीस को सही-सही तरीक़े से जानने और समझने का दावा नहीं कर सकता।

मालूम हो कि मौलाना की स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन में बड़ी भूमिका रही है। 1857 में उन्होंने देश की चोटी के आलिमों के बुलावे पर मक्का से सीधे मेरठ का रुख़ किया। और स्वाधीनता की लड़ाई में आलिमों और जांबाज़ सिपाहियों का नेतृत्व भी किया।
आज ख़िज़िरचक की उस लाइब्रेरी की जगह पर एक ख़ूबसूरत इमारत तैयार है, जो उनकी आन बान और शान की गवाही देती हुई नज़र आ रही है। उनके नाम पर एक आलीशान मस्जिद बनी है। इस मस्जिद में नमाज़ पढ़कर आपको सकूं का एहसास होगा। ख़ुद मुझे इसी तरह का एहसास हुआ।

मौलाना मोहसिन यहिया तिरहुति रह.के ट्रस्ट की निगहबानी उनके पोते के भगना सैयद मिसबाहुद्दीन अशरफ़ कर रहे हैं। हमारी अशरफ़ साहब से पहली मुलाक़ात हुई। और तबादला ए ख्याल हुआ। हम दोनों एक ही ख़ानदान, जड़ और जज़्बे के हैं। इस मौक़े पर मैंने उनके एजाज़ में उन्हें शॉल ओढ़ाया। अपनी मशहूर इंटरव्यू की पुस्तक सामना बराए नजर की। और दूसरा मत ब ग्लोबल ऑब्जर्वर उन्हें पेश किया। उन्होंने भी चलते चलते इत्र की शीशी पेश की, इस दुआ के साथ कि आप इसी तरह इल्म की ख़ुशबू फैलाते रहें। ये तस्वीरें उसी हसीन पल की यादें ताज़ा करा रही हैं।
